Friday, April 26, 2024

गँवार

आजकल ख़ुद से ही फ़रार हैं हम 
कहीं मसरूफ़ लगातार हैं हम 
लाख कह लो के तुम नहीं मेरे 
फिर भी तेरे ही बार बार हैं हम 

रूठ कर रुख भी ऐसे मोड़ लिया 
और कहते हो ऐतबार हैं हम 

तुम कहो ना कहो पता है हमें 
तेरे ही दिल में गिरफ़्तार हैं हम 

तेरी नज़रों की खोज लाज़िम है 
इत्तेफ़ाक़न बड़े मक्कार हैं हम 

इस क़दर तेरी बेक़रारी देख 
लोग समझेंगे इंतज़ार हैं हम 

दिल ये दुखता है इस हक़ीक़त से 
तेरी नज़रों में गुनाहगार हैं हम 

देख तफ़्सील से सुकूं से ज़रा 
आईने में तेरा सिंगार हैं हम 

शहर के तौर यहाँ बे ढब हैं 
इन रिवाज़ों में तो गँवार हैं हम 

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