आजकल ख़ुद से ही फ़रार हैं हम
कहीं मसरूफ़ लगातार हैं हम
लाख कह लो के तुम नहीं मेरे
फिर भी तेरे ही बार बार हैं हम
रूठ कर रुख भी ऐसे मोड़ लिया
और कहते हो ऐतबार हैं हम
तुम कहो ना कहो पता है हमें
तेरे ही दिल में गिरफ़्तार हैं हम
तेरी नज़रों की खोज लाज़िम है
इत्तेफ़ाक़न बड़े मक्कार हैं हम
इस क़दर तेरी बेक़रारी देख
लोग समझेंगे इंतज़ार हैं हम
दिल ये दुखता है इस हक़ीक़त से
तेरी नज़रों में गुनाहगार हैं हम
देख तफ़्सील से सुकूं से ज़रा
आईने में तेरा सिंगार हैं हम
शहर के तौर यहाँ बे ढब हैं
इन रिवाज़ों में तो गँवार हैं हम
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