Friday, September 27, 2024

ज़ियादती

ये फ़नकारों की कहते हैं अलामती नहीं करते 

दिल से करते हैं तारीफ़ें बनावटी नहीं करते 

बड़ी खूबी से रखते हैं नाम सबका ये अज़मत से 

ज़िया की आदत है ये भी ज़ियादती नहीं करते 


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जो झलक भी न दिखाए तो फज़ल ही क्या है 

जो समझ सबके ही आये वो अज़ल ही क्या है 

जो तुझे सैर कराये ना  हकीकत की तरह 

जो तरन्नुम न सजाये वो ग़ज़ल ही क्या है 

Thursday, September 26, 2024

काफ़िर

जो तपन में से जल के कुंदनों सा आता है 
दास्तानों में अपनी सरकशी सुनाता है
व हि तो है इक शाइर का ज़खीरा हम तो बस 
मिसरे कुछ लिखे खुद हि खुद से आशिकी कर ली


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शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
मुझे भी तजरुबा करना था ज़ीस्त का मैंने 
बड़ों के तालिमात-ओ-दर से ज़िन्दगी कर ली 

खाब कल रात खेलता था राज़दारी मैं 
छुपा के बात को रखना था वरना मेरी शह 
और मुझे राज़ छुपाना भी नहीं आता था 
तो ज़ुबान अपनी काट के ही बे-बसी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
 
कोई तशख़ीस करे खुद की क्या मज़ाक़ है ये 
हमने सुन रखा है इफ़रात दर्दनाक है ये 
हमें ना जुर्म दिखा ना ही कोई खुद गरजी 
हमने हर एक ग़म के घर की तलाशी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
 
जो तजरुबों की तपन में से जल के आता है 
बहर ग़ज़ल में अपनी सर कशी सुनाता है 
वो ही शायर है असलियत में देख लो हम तो 
दो एक शेर लिखे खुद से आशिक़ी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

वो नसीहत भरे कलाम पढ़ा करता था 
वो किसी से भी नहीं बस ख़ुदा से डरता था 
जब उसे इल्म-ओ-नसीहत की बूझ आई तो 
एक काफ़िर ने कलामों से बेरुखी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

तो क्या हुआ जो हम ना हो सके किसी काबिल 
तो क्या हुआ जो मिला है हमें ये मुस्तकबिल 
ग़मों को मिल ना सका ग़म भरा माहौल यहाँ 
तभी ग़मों ने सजाकर हमें खुशी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

Wednesday, September 18, 2024

फ़रेबी

वो मेरा दिल से हो न पाया कभी 
दाग़ मैं दिल के धो न पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

क्योंकि खुशियां भी सलामत न रहीं
मुझको खुशियों की भी आदत न रही
मेरे दुश्मन भी जानते हैं मैं
अपनी ख़ुशियों में खो ना पाया कभी
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

मैं आदमी के जिस्म में हूँ बसा 
मुझको लोगों ने... जब जब है डँसा  
अश्क़ भी मेरे फ़रेबी निकले 
रोना चाहा तो रो ना पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

हैसियत मेरी किस मिसाल की है 
दर असल बात ये वबाल की है 
खुद परस्ती की ऐसी दुनिया में 
फ़ैसला मेरा हो ना पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

आज ग़मगीन सा है घर मेरा
सबने देखा तो है सफ़र मेरा
मैंने लूटे थे चैन लोगों के 
चैन से मैं भी सो न पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

Sunday, September 15, 2024

अख़बार

असली शायर: अदा जाफ़री 

तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

Friday, September 13, 2024

पत्थर

Behr (2122 121 222)

After learning Behr Grammar

लख्त-ए-खूँ है ये रेत कर देखो 
कैफ़ियत है समेट कर देखो
लाल रंग का है इसमें लावा सा 
अपने हाथों से छेड़ कर देखो
[लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani)

क्या है के ज़िन्दगी तो नाटक है
और किरदार सबके आवारा
हर दफा तुम ही क्यूं बनो क़ातिल
इक दफ़ा मौत का भी डर देखो

देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
शोर करते हैं ये तुझे होके 
दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 


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Before learning behr Grammar

लख्त-ए-खूँ है रेत कर देखो 
ये कैफ़ियत समेट कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 
[लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani, नुमाइश  = exhibition]

फिर किसी का दिलरुबा होना 
मेरी वफ़ा का बेवफ़ा होना 
अपने दिल की ख्वाहिशों के लिए 
इक दफ़ा तुम फ़रेब कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
शोर करते हैं ये तुझे होके 
दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

बे-असर

Behr (2122 1212 112)
After

ज़र्फ़-ए-हस्ती तो साज़ गर ही रही
शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही
पोश सारे नक़ाब चेहरों पे
मेरी हर बात बे-असर ही रही

हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते रहो 
ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे रहो 
क्या नतीजे हैं गुफ्तगू से मिले 
तेरी बातें अगर मगर ही रही 

ज़िन्दगी झील हम किनारे रहे 
जाने कितनों के हम सहारे रहे 
बात इतनी सी पालने के लिए 
हम इधर थे तो वो उधर ही रही 

कल वफ़ाओं की रात चलती रही 
जाने उनकी कमी क्युं खलती रही 
आँख दुनिया की जब सितारे हुईं 
अपनी पूछो तो आँख तर ही रही 

ये जो फितरत की बात करते रहे 
अपनी आदत से रोज़ मरते रहे 
जिस्म इन्सां का बस मिला था इन्हें 
रूह फिर भी तो जानवर ही रही 

हमको महफिल में वो बुलाते रहे
सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
बात सबने मेरी सुनी तो मगर 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

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Before 

ज़र्फ़-ए-हस्ती साज़ गर ही रही 
शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही 
नक़ाब पोश सारे चेहरों में 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते हो 
ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे हो 
क्या नतीजे निकलते बातों के 
बात अपनी अगर मगर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

ज़िन्दगी झील हम किनारे हैं 
एक दूजे के हम सहारे हैं 
बात इतनी संभालने के लिए 
मैं इधर था तो वो उधर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

जब वफ़ाओं की बात चलती है 
जाने किसकी कमी सी खलती है 
रात नज़रें सभी सितारे हुए 
मेरी पूछो तो आँख तर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 


फितरतों की ये बात करते हैं 
अपनी आदत से रोज़ मरते हैं 
जिस्म इन्सां का बस मिला इनको 
रूह फिर भी तो जानवर ही रही 
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

महफिलों में मुझे बुलाते रहे
सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
बात सबने मेरी सुनी लेकिन
मेरी हर बात बे-असर ही रही 

मेरी हर बात बे-असर ही रही 

राग़िब

राग़िब न कर मेरी रूह को 
अरमाँ ये खो गए हैं 
रहने दो चाँद की ज़द अभी 
वो ख़याल सो गए हैं 

तेरी जीत का मेरी हार का 
हर बार का जो है सिलसिला 
है क़रार अहद-ए-ख़िलाफ़ का 
कहाँ ज़ख्म ये नए हैं 

जो दिला रहे तुझे हौसले 
रख उनसे भी कुछ फ़ासिले 
मुझे क्या पता तेरे दिल में वो 
क्या शुबा सा बो गए हैं 

ये इधर उधर की ही बात है 
कभी साथ है कभी मात है 
अब क्या कहें के वो कौनसा 
दुःख अपना रो गए हैं 

Monday, September 9, 2024

अक्सर

    Behr 2122 2122 2122

After

शायरों की ये बुरी आदत है अक्सर 
क़ैद करते हैं ये कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
फ़लसफ़ों को लिख लिया करते हैं अक्सर 

हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

जिनसे आँखों को मिला पाना है मुश्किल 
वो गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

करते हैं ईमान की बातें जो हमसे 
एक बोली में ही बिक जाते हैं अक्सर 

जिन के घर की हैं दिवारें आसमाँ तक 
उनके घर तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 

जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
आदतें भी वो दे ही जाते हैं अक्सर 

प्यार की तौज़्ही जिन्हें मालूम ना हो  
प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 


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Before

शायरों की बुरी आदत है अक्सर 
क़ैद करते हैं कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
फ़लसफ़ों को ही लिखा करते हैं अक्सर 

हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

जिनसे आँखें मिला पाना है मुश्किल 
गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

करते हैं बातें जो ईमान की हमसे 
एक बोली में बिक जाते हैं अक्सर 

जिनके घर की दीवारें आसमाँ तक 
वो ही तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 
 

जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
आदतें भी वो दे जाते हैं अक्सर 

प्यार क्या है जिन्हें मालूम नहीं है  
प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 

Friday, September 6, 2024

मैं सोचता हूँ

मैं सोचता हूँ 
मैं सोचता हूँ ये कहना - कितना मुनासिब है 
ये मेरी सोच है कितनी, ये कितनी ग़ैर जाज़िब है  
मैं सोचता हूँ के अगर यहाँ मैं हूँ तो कितना हूँ 
ज़हन में काएनातें हैं और मैं ज़र्रे जितना हूँ
[ग़ैर जाज़िब = unwelcome]

मेरा हर लफ़्ज़ हर इक बात मेरी तो नहीं होती  
मेरी हर बात 'ज़ाहिर' है के मेरी तो नहीं होती  
मेरे एहसान, बद-कारी से एक हक़त नहीं होती 
न मेरा है तसव्वुर कुछ न इख्तियार है कोई 
जो कुछ भी हो रहा है इसके पीछे है तो बस वो ही  

वोही शिरक़त कराता है एक ज़र्रे की ख़िदमत में 
वो न चाहे तो सूरज भी नहीं आएगा दुनिया में 
किसी इंसान में ताक़त ये इतनी हो नहीं सकती 
जिसे देखा नहीं उसको ये आँखें रो नहीं सकती 

मैं सोचता हूँ 
मैं सोचता हूँ मुझे कुछ सोचना ही नहीं आता 
ज़हन मे कुछ खुदा है कुछ भुलाया नहीं जाता 
मैं तो मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ उसका 
बिना देखे बिना जाने मैं तलबगार हूँ उसका 
[तलबगार = thirsty] 

साँस आती है 
सुकूं मिलता है, ज़हन चलता है, 
हाथ उठता है, क़लम लिखती है, 
आँख से देख ज़ुबाँ कहती है
और मैं सोचता हूँ कि "मैं" सोचता हूँ 

Thursday, September 5, 2024

तनहाई

Bahr (2122 122 1212 22)

याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा 
तेरी मर्ज़ी न थी तक़दीर भी है शर्मिंदा 
माना मुश्किल है मगर तू किसे बताएगा 

लाज़मी है के नहीं छोर कोई चाहत के 
क्या दबा के इन्हें रातों में तू सो पायेगा 

बात बचकानी सी मासूमियत कि करते हो 
चाह लोगे जिसे दिल से तुझे वो चाहेगा

एक दिन तू भी तो हो जाएगा ख़ुदा हाफ़िज़ 
कोई फिर तुझसा ही रोयेगा भूल जाएगा 

याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा

 

तो क्या

अगर तू है तो क्या है 
अगर मैं हूँ तो क्या 
ये मजमा बे पनाह है 
मैं ना रहूँ तो क्या 
[मजमा = भीड़]

कहाँ ख़ुश है तू फिर भी 
तुझे कितना मिला
मिले हमें मिले जो 
जो ना मिले तो क्या 

ख़्वाहिशें खिल ना पाई 
सिलसिला-ए-गिला 
कभी मिले नहीं जो  
जुदा हुए तो क्या 

ये मुमकिन है के तुझसे 
प्यार उसको न हो 
मगर फिर सोचता हूं
अगर हुआ तो क्या 

चंद टुकड़ों की खातिर  
ज़दें दिखला मुझे 
जो हासिल कर लिया तो 
न कर पाए तो क्या 

हजारों चाँद तारे 
अकेला आसमाँ 
अगर ये आसमाँ में
ना होते भी तो क्या 

रोज़ बातें वही हैं 
नया कुछ भी नहीं 
जुगाली आदतों की 
अगर कर ली तो क्या 

मिला ऐसा ना कोई 
कहे जो फैसला 
मेरे हक़ में हुआ है 
ना होता भी तो क्या 

रवायत है के दुनिया 
वजाहतों से है 
है अफ़सुर्दा ज़माना 
ख़ुदा भी है तो क्या 
[रवायत = रिवाज़, वजाहत = आदर, अफ़सुर्दा = बे-हाल]
 
ये बातें कह रहा हूँ 
तो लगता है मुझे 
मुझे सबने सुना है 
न भी सुना तो क्या

Monday, September 2, 2024

एकाकार

छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 

भय सू थर थर काँप रहौ सब 
मरणौ है सबकु अब की तब 
या मन कैसौ ई सरीर से 
करीहें बेड़ा पार 

ना हुइहें एकाकार

मैं आपन भरम जाल बनावे 
सत सुर बा केहु ना सुनावै 
सत जेहि समझे मन तेही मैं के 
पूरन हो संस्कार 

ना होइहें एकाकार 
छन भंगुर या मन सन एकाकार
ना हुइहें एकाकार 

या सरीर के सबरे अवयव
सब कुं सब बेकार 
ना हुइहें एकाकार 
ना हुइहें एकाकार 

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...