मैं सोचता हूँ
मैं सोचता हूँ ये कहना - कितना मुनासिब है
ये मेरी सोच है कितनी, ये कितनी ग़ैर जाज़िब है
मैं सोचता हूँ के अगर यहाँ मैं हूँ तो कितना हूँ
ज़हन में काएनातें हैं और मैं ज़र्रे जितना हूँ
[ग़ैर जाज़िब = unwelcome]
मेरा हर लफ़्ज़ हर इक बात मेरी तो नहीं होती
मेरी हर बात 'ज़ाहिर' है के मेरी तो नहीं होती
मेरे एहसान, बद-कारी से एक हरक़त नहीं होती
न मेरा है तसव्वुर कुछ न इख्तियार है कोई
जो कुछ भी हो रहा है इसके पीछे है तो बस वो ही
वोही शिरक़त कराता है एक ज़र्रे की ख़िदमत में
वो न चाहे तो सूरज भी नहीं आएगा दुनिया में
किसी इंसान में ताक़त ये इतनी हो नहीं सकती
जिसे देखा नहीं उसको ये आँखें रो नहीं सकती
मैं सोचता हूँ
मैं सोचता हूँ मुझे कुछ सोचना ही नहीं आता
ज़हन मे कुछ खुदा है कुछ भुलाया नहीं जाता
मैं तो मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ उसका
बिना देखे बिना जाने मैं तलबगार हूँ उसका
[तलबगार = thirsty]
साँस आती है
सुकूं मिलता है, ज़हन चलता है,
हाथ उठता है, क़लम लिखती है,
आँख से देख ज़ुबाँ कहती है
और मैं सोचता हूँ कि "मैं" सोचता हूँ