रात की बात अंधेरों में फैल जाती है
धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है
इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर
तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिलने आती है
तेरी ख़ुश्बू में जाने क्या बात ऐसी रही
के वो अशरों के बाद भी ज़हन से जाती नहीं
अब तो आदत ही हो गई है और मेरे लिए
तुझे महसूस करना कोई बड़ी बात नहीं
किसके मानिंद है ख़ुश्बू तेरी मैं कैसे कहूँ
के कोई इत्र कोई फूल ऐसा मिल न सका
मुस्कराहट तेरे जैसी किसी को मिल ना सकी
और दुनिया में कोई तेरे जैसा खिल न सका
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