आदत की बात है ये इन्सां की चाहतों में
ये दिन के बाद अक्सर ही शाम चाहता है
हर इक को ज़िन्दगी में एक नाम तो मिला है
फिर भी वो ज़िन्दगी में एक नाम चाहता है
जम्हूरियत का होना बस नाम के लिए है
होता कहाँ है जो कुछ अवाम चाहता है
जो ज़िन्दगी में अपनी ख़ुद सर नहीं हुआ है
वो ज़िन्दगी भी अपनी आज़ाद चाहता है
ना सोचने की कोशिश दमाग़ कर रहा है
जैसे थका मुसाफ़िर आराम चाहता है
दर पे खड़ा हूँ तेरे इस तरह जैसे कोई
बेरोज़गार इन्सां कुछ काम चाहता है
ऊपर वो आसमा में बादल खड़ा है जैसे
लम्बी सज़ा का मुजरिम अंजाम चाहता है
फूलों की ख्वाहिशों में काँटा ही बन चुका है
वालिद की फ़िक्र बेग़म औलाद चाहता है
शायर के फ़लसफ़े में मेहनत लगी बड़ी है
पढता तो शेर है बस इक दाद चाहता है
बेताब सा सितारा तन्हाइयों का मारा
कहना है कुछ उसे वो आवाज़ चाहता है
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