Thursday, April 18, 2024

आवाज़

आदत की बात है ये इन्सां की चाहतों में 
ये दिन के बाद अक्सर ही शाम चाहता है 
हर इक को ज़िन्दगी में एक नाम तो मिला है 
फिर भी वो ज़िन्दगी में एक नाम चाहता है 

जम्हूरियत का होना बस नाम के लिए है 
होता कहाँ है जो कुछ अवाम चाहता है 

जो ज़िन्दगी में अपनी ख़ुद सर नहीं हुआ है 
वो ज़िन्दगी भी अपनी आज़ाद चाहता है 

ना सोचने की कोशिश दमाग़ कर रहा है 
जैसे थका मुसाफ़िर आराम चाहता है 

दर पे खड़ा हूँ तेरे इस तरह जैसे कोई 
बेरोज़गार इन्सां कुछ काम चाहता है 

ऊपर वो आसमा में बादल खड़ा है जैसे 
लम्बी सज़ा का मुजरिम अंजाम चाहता है 

फूलों की ख्वाहिशों में काँटा ही बन चुका है 
वालिद की फ़िक्र बेग़म औलाद चाहता है 

शायर के फ़लसफ़े में मेहनत लगी बड़ी है 
पढता तो शेर है बस इक दाद चाहता है 

बेताब सा सितारा तन्हाइयों का मारा 
कहना है कुछ उसे वो आवाज़ चाहता है 

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