Sunday, December 15, 2024

खुदगर्ज़

इन्साफ़ ज़ुल्म को जो कभी तोलता न हो
जो देख ले कभी तो ज़ुबाँ खोलता न हो
खुदगर्ज़ कितना है ये जो इंसान सोचना
ऐसा ख़ुदा बनाया के जो बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

दिन रात खेत में जो पसीने से तर हुआ
उसको कोई मिला नहीं जो मोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

बच्चों कि बात तब हि तलक रास आती है
जब तक वो अपनी बात सफ़ा बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

हमराज़ वो ही आखरी दम तक जो कारगर
मर जाए अपने राज़ कहीं खोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

इन्साफ करे ऐसा कोई भी नहीं मिला 
ग़म और ख़ुशी जो एक साथ घोलता न हो ||

'ज़ाहिर' कभी हुआ ही नहीं शर्तिया यहाँ  
कोयल सी हो आवाज़ मगर वो लता न हो || 

Saturday, December 14, 2024

क़ातिल

तेरी अदीम निगाहों ने बे पनाह किया
बिना किये मुझे आगाह ही तबाह किया
ये किस तरह कि है उल्फत के मेरी फ़िक्र नहीं
न कैद ही किया मुझको न ही रियाह किया
[अदीम = Unique, आगाह = Warn, रियाह = Set free]

शराब रात कि बूंदों से बारहाती रही
तो जाम ने भी उसे मन्ज़रे गुलाब किया
[बारहाती = Again and Again = Multiple Occurrence]

न गिन सका है कोई भी दिए ये ज़ख्म तेरे
न जाने कितनों ने आकर यही हिसाब किया

ये तार तार से दिल में जो साँस बच के रही
उसे भी हैरते 'ज़ाहिर' ने है मज़ार किया

ये क्या मज़ाह किया है नसीब ने मुझसे
के मैंने अपने ही क़ातिल से रस्मो राह किया
[मज़ाह = Joke, रस्मो राह = Contact/Relation]

Friday, December 13, 2024

ज़िंदगी

ज़िन्दगी ज़िन्दगी हर तरफ ज़िन्दगी
लाख़ कुनबों का है ये शजर ज़िंदगी 
दौर है मुख़्तसर आरज़ू ऐं बड़ी
मौत से मौत तक का सफ़र ज़िंदगी 
[शजर = Tree,  दौर = Time, मुख़्तसर = small, आरज़ू = desire]

वक़्त के छोर पर जो विदा कर चले 
फिर उसी राह पर मुंतज़र ज़िंदगी 
[मुंतज़र = इंतज़ार में ]
 
सबकी आँखों से देखे सुने कान से 
बात 'ज़ाहिर' करे उम्र भर ज़िंदगी 

फ़िक्रे अंजाम से है परेशान तू 
किसकी नज़रों में है सर बसर ज़िंदगी 
 
क्या है अच्छा बुरा पाक बे काएदा
इन सवालों से है बेख़बर ज़िन्दगी

हर सफ़र के किनारे ख़रीदी हि थी 
इक नई ज़िन्दगी बेचकर ज़िन्दगी

नाम कर ले मगर एक दिन ये तुझे 
कर ही जाएगी फिर गुमशुदा ज़िंदगी 

तू नज़र यार अपनी बदल इक दफ़ा
मौत के बीच में है अमर ज़िंदगी 
[नज़रिया = point of view]
 
आग पानी हवा का घुलन भर है ये 
है धड़कती हुई साँस भर ज़िंदगी 

हिना

सहर हुई है तो चेहरा निखर चुका होगा
वो मेरि हर्फ़ गरी से उबर चुका होगा

नशा कभी न कभी तो उतर ही जाता है 
खुमार प्यार का अब तक उतर चुका होगा
[हर्फ़ गरी = लिखने का काम, खुमार = hangover]


जगह बची न थी मेरी हिना कि रस्मों तक 
तमाम नाम से वो हाथ भर चुका होगा
[हिना = Mehandi]

जिस एक गुल पे फ़िदा है अभी तलक ये दिल
वो सच में और किसी का ही हो चुका होगा

गली कि खुश बू ये कहती है वो ही आया था
इधर की ओर से 'ज़ाहिर' है वो मुड़ा होगा

सवाल सोचते हो तुक लगा के तुम इतने
जवाब जो मिलेगा मुझसे बे तुका होगा
[तुक = Logic]

Tuesday, December 10, 2024

इंतज़ार

प्यार करते हैं उन्हें ऐसे प्यार करते हैं
प्यार के वास्ते ही रोज़ गार करते हैं
उनसे क्या मिलना जो खाबों से हैं बसे दिल तक
हम कहाँ उनका कभी इंतज़ार करते हैं

दोस्त वो है जो संभाले किसी को राहों में
जो सँभलते नहीं हम उनको यार करते हैं

हम तो वो हैं के जहाँ बैठ जाएँ जन्नत है
आप जन्नत का भी क्या एतबार करते हैं

जो रकम दे नहीं सकते हैं सारी दुनिया को
वो तो बस लफ़्ज़ का ही कारोबार करते हैं

जो बताते नहीं हैं प्यार कितना है तुमसे 
वो ही तो प्यार तुम्हें बेशुमार करते हैं

करते 'ज़ाहिर' जो हमें तो क़रार मिल जाता 
कुछ न कहके वो हमें बेक़रार करते हैं 

कोशिश

Bahr: 221 1221 1221 122

करते तो हैं कोशिश ये मुक़द्दम नहीं होता
हम दम तो भरें पर कोई हमदम नहीं होता
चादर खुशी की तान के सोते हैं कभी तो
दुनिया को यही ग़म के हमे ग़म नहीं होता
[मुक़द्दम = Important]

आगाज़ किया करते हो किस्मत के सहारे
अंजाम कभी तेरा मुसल्लम नहीं होता
[आगाज़ = Start, मुसल्लम = accepted]

ये किस तरह से बांधते हो पाँव में घुँघरू
के नाचते हो फिर भी ये छम छम नहीं होता

मौसम की तलाशी में भटकते हो मुसलसल
कैसे कहें के प्यार का मौसम नहीं होता
[मुसलसल = Continuously]

तब तक नहीं होता कोई नादान से दाना
जब तक वो ज़माने में मैं से हम नहीं होता
[दाना= Mature]

देखे हैं कई लोग हैं ऐसे वो बेचारे
जल जाती है रस्सी पर अहम् कम नहीं होता
[अहम् = Ego]

'ज़ाहिर' की ये बातें तो महज़ कोशिशें ही हैं
जितना भी लिखें मस्त दमादम नहीं होता 
[दमादम = Consistently]

Monday, December 9, 2024

अलफ़ाज़

Bahr: 2122-1122-1122-112


कौन पढ़ता है क़िताबों के ये औराक़ सभी
याद रहते हैं किसे प्यार के आग़ाज़ कभी
राब्ता हैं यूँ सभी हम से हो बर्बाद ये दिल
बस तमाशे की तरह देखते अंजाम सभी

दिल को पत्थर का बना कर किसी बच्चे कि तरह
आग रगड़न से लगाते हैं ये मुश्ताक़ सभी

कश म कश दिल में लिए जो भी मिला कहता मुझे
दिल कशी से ही तो होती है ये शुर वात सभी

दिल कि चोटों से निखर आएं मेरे नक़्श नयन
हर्ज क्या है जो तराशे कोई चट्टान कभी

मैं तसव्वुर कि ही बातों से महक जाऊ यहाँ
वो हक़ीक़त में नहीं होता है इफ़रात कभी
[तसव्वुर = imagination , इफ़रात = satisfy]

गर्मी ए दिल पे ही नाचेगा ये पारे का जुआ
ये हैं 'ज़ाहिर' दिल ए बर्बाद के अलफ़ाज़ सभी

Friday, December 6, 2024

अजनबी

Bahr: 212-212-212-212


हम भि हैं अजनबी तुम भि हो अजनबी
रास्ते अजनबी मंज़िलें अजनबी
सोचा हम ही चलो बात कर लें जहाँ
है सफ़र अजनबी हर नज़र अजनबी

हमने सोचा बोहोत और पाया यही
हर किसी तौर पर हर कोई अजनबी
ज़ाइदों के लिए बारहा ही रहा
है ज़हन अजनबी और बदन अजनबी
[ज़ाइद = छोटे बच्चे, बारहा = हमेशा से]

ये जो पहचान है ये भी मिट जाएगी
दर-बदर रूह भटकेगी फिर अजनबी
दीद की बात कहता है 'ज़ाहिर' सुनो
ज़िन्दगी अजनबी मौत भी अजनबी
[दीद = philosophy]

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
सीख लेती है एहले हुनर अजनबी
घर बसाने की खातिर चली जाती है
हो जहाँ पर की दीवारो-दर अजनबी

हाल तेरा जो है वो पता है मुझे
माना तकदीर का है ज़हर अजनबी
छोड़ दो वक़्त को वक़्त के हाल पर
है फ़िकर अजनबी चारगर अजनबी
[चारगर = solution दिलाने वाला]

Thursday, December 5, 2024

हद करते हो

Bahr: 22-22-22-22

मेरी बातें ज़द करते हो 
अपनी तो लज़्ज़त करते हो 
कैसे मानोगे के तुम तो 
हद करते हो हद करते हो

देखो अब हम घर आये हैं
दिन काला हम कर आये हैं
अंगड़ाई तुम क्यूँ भरते हो
हद करते हो हद करते हो

मेहताबी है आँखें तेरी
दानाई हैं बातें मेरी
रोशन रातें गुम करते हो
हद करते हो हद करते हो

तौबा हमने की है दिल से
धड़कन थामी है मुश्किल से
क्यूँ धड़कन गड़बड़ करते हो
हद करते हो हद करते हो

मंज़िल जो थी अब रस्ता है
अब जब सब लगता सस्ता है
अब किस मंज़िल से डरते हो
हद करते हो हद करते हो

'ज़ाहिर' चाहत जब है दिल में
बैठे हो तुम किस मुश्किल में
हद की बातें क्यूँ करते हो
हद करते हो हद करते हो

जब भी ग़ज़लें पढ़ता हूँ मैं
या कह लो के मढ़ता हूँ मैं 
वावाही का दम भरते हो 
हद करते हो हद करते हो

Wednesday, December 4, 2024

याद आना चाहता हूँ

असली शायर: फ़हमी बदायूनी 

मैं बस के ये बताना चाहता हूँ
मैं तुमसे दूर जाना चाहता हूँ
के हिज्र में किसी कमी की तरह
मैं तुमको याद आना चाहता हूँ

ये तुमसे दिल धड़क रहा है मेरा 
मैं इसका मेहनताना चाहता हूँ

ये कैसा वक़्त हो चला है अभी 
मैं वो अपना ज़माना चाहता हूँ

ये किसने बद्तमीज़ हद बनाई
मैं इसके पार जाना चाहता हूँ

बस एक शै पे क्या उछलते हो तुम
मैं तुमसे मात खाना चाहता हूँ

तुम मेरे हो के तुम मेरे ही तो हो 
'ज़ाहिर' है तुमको पाना चाहता हूँ

Tuesday, December 3, 2024

पुराना

Bahr: 1222-1222-122


मेरा कहना अभी खलता नहीं है
कोई मुझसे यहां जलता नहीं है
किसी से कल कोई ये कह रहा था
पुराना नोट अब चलता नहीं है

ये किन राहों पे है निकला ज़माना
के सूरज शाम को ढलता नहीं है

ये कैसा आदमी बेदर्द है के
लगी है चोट पर मलता नहीं है

पुराना ही तो कहलायेगा मुझसा
हवा के साथ जो चलता नहीं है

मगर अब तक नहीं बदला वो ये के
कभी दिन मौत का टलता नहीं है

दफ़न होकर जिसम पिघला तो है पर
न जाने क्यूँ ये दिल गलता नहीं है

Monday, December 2, 2024

बस ख़्वाब है

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 
सोए हुए हम तुम सभी 
झूठे सभी जज़्बात हैं 

इस नींद में थकना भी है 
रोना भी है हँसना भी है 
इस नींद में जगना भी है 
फिर नींद में सोना भी है 

ख़्वाबों के भी कुछ ख़्वाब हैं 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

ये ख़्वाब भी है कमाल का 
है मलाल खुद ही सवाल का 
है हयात का तेज़ाब का 
है नशा ये जैसे शराब का 

ख़्वाबों की ये इक किताब है 
झूठे सभी जज़्बात हैं 
सोए हुए हम तुम सभी 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

बस ख़्वाब है बस ख़्वाब है 
ये ज़िन्दगी बस ख़्वाब है 

Sunday, December 1, 2024

बात इतनी सी है

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

क्या मुनासिब है क्या है रवायत यहाँ 
पीढ़ी दर पीढ़ियों तक जो कहता रहा 
पर मुनासिब था तब जो ये किसको पता था 
मुनासिब रहेगा हमेशा यहाँ 
बात इतनी सी है 

है मेरी नाक तुझसी मेरी आँख तुझसी 
मेरे हाथ तुझसे मेरी भूख तुझसी 
धरम और मज़हब ने कब तुझसे मुझको 
अलग था बताया ज़रा ये बता 
बात इतनी सी है 

चाँद सूरज सितारे या फिर आसमां 
ज़िन्दगी सबको देते हैं इक सी यहाँ  
कुइ पंछी कभी भी किसी और पंछी 
को कहता नहीं मैं यहाँ तू वहाँ 
बात इतनी सी है 

जीभ पे ज़ायक़ा तो सभी का है इक सा 
नमक कोई मीठा तो कहता नहीं 
ये दिल चाहे कितनी करे ऐहतरामी 
मगर बे लिहाज़ी भी सेहता नहीं 
बात इतनी सी है 

तू सच है तो सच ये भी है के कोई 
झूठ की डोर को है संभाले हुए 
अगर झूठ ही न हुआ करता तो क्या तू 
दीखता कभी दिल जलाते हुए 
बात इतनी सी है 

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...