ज़ेह्न को 'ज़ाहिर' कहाँ आराम है
Thursday, February 27, 2025
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है
ज़ेह्न को 'ज़ाहिर' कहाँ आराम है
Wednesday, February 19, 2025
ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी
तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी
मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं 'ज़ाहिर' तुझ को
जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर है ये मेरी ख़ामोशी
बात कहने से तो चुक जाती हैं सारी बातें
मेरी बातों में अमर है ये मेरी ख़ामोशी
बे ख़याली तो नहीं होती न कुछ कहने से
तो ख़यालों का शजर है ये मेरी ख़ामोशी
फिर भी ये शोर जो रुकता तो ज़हन सो लेता
सोचता हूँ के किधर है ये मेरी ख़ामोशी
शाम 'ज़ाहिर' कि लिए जाम गुज़र जाती है
इस गुज़र में ही बसर है ये मेरी ख़ामोशी
Thursday, February 13, 2025
क्या कहूँ
सब चाहते हैं मैं भी तुझे बेवफ़ा कहूँ
पर मैं ये चाहता हूँ तुझे शुक्रिया कहूँ
घिस पिट चुके हैं सारे मलामत के पैंतरे
सोचा तुझे मैं जाते हुए कुछ नया कहूँ
इतने हैं रहनुमा कि यहाँ सोचता हूँ मैं
किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ
ग़म दिल में लेके जी रहा हूँ ज़िंदगी हर पल
ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं या ग़म शुदा कहूँ
लोगों के तजस्सुस पे अपनी उम्र क्या कहूँ
कितना मैं जी चुका हूँ या कितना मरा कहूँ
‘ज़ाहिर’ तलाशता है कोई ख़ुद सा अजनबी
अब कब तलक मैं आईने को ही बुरा कहूँ
Wednesday, February 12, 2025
दिन आ रहे हैं
आहट
Tuesday, February 11, 2025
कोई पागल समझता है
और भी हैं
असली शायर: अल्लामा इक़बाल
निगाहों परे आसमाँ और भी हैं
यहीं इक नहीं आशियाँ और भी हैं
है सर पे फ़लक हैं फ़लक पे सितारे
सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
नहीं तू सही, तू नहीं इक सहारा
मेरे हुस्न के कद्रदाँ और भी हैं
किसी इक ज़बाँ की नहीं मिल्कियत तू
मोहब्बत तेरे हम ज़ुबाँ और भी हैं
गुनाहों की बातें ज़रा रुक के सुनना
मेरे दोस्तों के बयाँ और भी हैं
है फ़ेहरिस्त लंबी यही बस नहीं है
मेरे नाम पे ग़लतियाँ और भी हैं
क्या 'ज़ाहिर' सभी अश्क़ तुझपे लूटा दूँ
अभी तुम चलो बे कुआँ और भी हैं
ख़ुशी मत मनाना अगर बैठ जाऊँ
मेरे पास तीर-ओ-कमाँ और भी हैं
Monday, February 10, 2025
देखता रह गया
असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी
आपको देख कर देखता रह गया
मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया
वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे
और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया
ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में
ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया
जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता
जो नहीं मिल सका ला पता रह गया
कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे
सोचते सोचते सोचता रह गया
दिल में इज़हार था और लब थे सिले
सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया
रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई
देख ले अब खुला आसमा रह गया
मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए
रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया
है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना
पूछ दिल कितना पाक-ओ-सफ़ा रह गया
Sunday, February 9, 2025
सुख़न
आदमी ज़ोफ़-ए-तन देख सकता नहीं
रश्क अह्ल-ए-सुख़न देख सकता नहीं
है अना वो बला सर पे चढ़ जाये तो
पैरहन पैरहन देख सकता नहीं
[ज़ोफ़-ए-तन = weakness of body, रश्क = jealousy, अह्ल-ए-सुख़न = poet, अना = ego, पैरहन = clothes]
देखते हैं सभी आईना पर कोई
आइने की घुटन देख सकता नहीं
जो मुझे दिख रहा है यहाँ से अभी
कोई ये अंजुमन देख सकता नहीं
[अंजुमन = नज़ारा]
चाँद को अब्र ढँक ले तो क्या फिर कोई
चाँदनी की किरन देख सकता नहीं?
[अब्र = बादल]
जो भी है बुत कदा और है ना ख़ुदा
वो मेरा फ़िक्र-ओ-फ़न देख सकता नहीं
[बुत कदा = जिसे सब कुछ पता हो, ना ख़ुदा = नास्तिक, फ़िक्र-ओ-फ़न = विचारों की कलाकारी]
जब से अपनों ने है मुझको रुख़सत किया
मैं ये अपना बदन देख सकता नहीं
[रूखसत = see off ]
आइने को न जाने गुमा क्या हुआ
के वो मेरा दहन देख सकता नहीं
[गुमा = अहंकार, दहन = face]
मैंने पड़ने न दी अपने सर पे शिक़न
अब कफ़न पे शिक़न देख सकता नहीं
वाइज़ों ने सुनाई थी जो दास्ताँ
मैं वो 'ज़ाहिर' अदन देख सकता नहीं
[वाइज़ = उपदेश देने वाला, अदन = Beautiful/Eden, ज़ाहिर = is my pen name]
मैं दराज़ों का शायर नहीं हूँ मुड़े
काग़ज़ों पे सुख़न देख सकता नहीं
[सुख़न = कविता]
Friday, February 7, 2025
तेरा ख़याल
Wednesday, February 5, 2025
टहनी
Sunday, February 2, 2025
देखा
इज़्ज़त
Matlaa:
इस दुनिया में सबको अपनी कुछ बात सुनानी होती है
रस्ते की कहानी है तो कहीं मंज़िल की निशानी होती है
बाज़ारी हो चेहरे की चमक या हो हाथों में फ़ोन नया
आपा धापी की दुनिया में औक़ात दिखानी होती है
शहरों की गर्दी में अपने अंदर क्या खून बचाओगे
जीवन की गाड़ी भी अब तो पानी से चलानी होती है
[गर्दी = revolution/क्रांति]
दुनिया वाले इक दूजे की दुनिया तो उजाड़े देते हैं
और फिर अपनी उजड़ी दुनिया ख़ुद को ही बसानी होती है
ये उम्र तमाशा है इसमें बचपन से है बूढ़ा होना
देखे दुनिया जिस मंज़र को अक्सर वो जवानी होती है
ये प्यार भी क्या है बला भला कैसी यादें दे जाता है
दिल पर जो दाग़ रहे वो ही दिलबर की निशानी होती है
है क़र्ज़ सभी के माथे पर तो फ़र्ज़ कोई क्या पालेगा
अपने काँधे पर ख़ुद अपनी ही लाश उठानी होती है
Maqtaa: (Takhallus - 'Zaahir')
होता ही नहीं है शहरों में तो वक़्त कहाँ से लाओगे
ख़ुद से ही 'ज़ाहिर' है ख़ुद को आवाज़ लगानी होती है
इज़्ज़त की बातें रहने दो अब नहीं ज़माना इज़्ज़त का
बोहतों को कार गुज़ारिश में इज़्ज़त ही गँवानी होती है
[कार गुज़ारिश = request for work]
अफ़वाही ज़िंदगी
किसको है मिला सुकूँ किसको है मिली ख़ुशी अफ़वाही है, अफ़वाही है अफ़वाही ज़िंदगी ख़ुशियों की जुस्तजू में हर कोई मिला दुखी अफ़वाही ...
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किसको है मिला सुकूँ किसको है मिली ख़ुशी अफ़वाही है, अफ़वाही है अफ़वाही ज़िंदगी ख़ुशियों की जुस्तजू में हर कोई मिला दुखी अफ़वाही ...
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वक्त गुज़रा हुआ सा लग रहा है और सब कुछ हुआ सा लग रहा है तुझको देखा है जबसे दिल पे मेरे कोई जादू हुआ सा लग रहा है तेरी खुशबू जो यादों ने उठाई...
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रात की बात अंधेरों में फैल जाती है धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिल...