Thursday, February 27, 2025

ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

सुबह थी कल, आज दिन, कल शाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

गुल नहीं बचता अगर गुल्फ़ाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

हर किसी के सर अधूरा काम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

नाम अपना है मगर बदनाम है 
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

साँस देती रूह को पैग़ाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

टूटना हर ख़ाब का अंजाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

हादसों से सीखना ईनाम है 
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

ज़ेह्न को 'ज़ाहिर' कहाँ आराम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

Wednesday, February 19, 2025

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी
तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी

मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं 'ज़ाहिर' तुझ को
जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर है ये मेरी ख़ामोशी

बात कहने से तो चुक जाती हैं सारी बातें
मेरी बातों में अमर है ये मेरी ख़ामोशी

बे ख़याली तो नहीं होती न कुछ कहने से
तो ख़यालों का शजर है ये मेरी ख़ामोशी

फिर भी ये शोर जो रुकता तो ज़हन सो लेता
सोचता हूँ के किधर है ये मेरी ख़ामोशी

शाम 'ज़ाहिर' कि लिए जाम गुज़र जाती है
इस गुज़र में ही बसर है ये मेरी ख़ामोशी

बुत तराशी जो किया करती है दुनिया मेरी
देती दुनिया को सिफ़र है ये मेरी ख़ामोशी

Thursday, February 13, 2025

क्या कहूँ

सब चाहते हैं मैं भी तुझे बेवफ़ा कहूँ

पर मैं ये चाहता हूँ तुझे शुक्रिया कहूँ


घिस पिट चुके हैं सारे मलामत के पैंतरे

सोचा तुझे मैं जाते हुए कुछ नया कहूँ


पा के जो खो दिया उसे क़िस्मत सा कह दिया 
खो के जो पा लिया मैं उसे फ़लसफ़ा कहूँ

दिल डूबता है तेरे ख़यालों में रात दिन 
तुझको नहीं तो और किसे दिलरुबा कहूँ

इतने हैं रहनुमा कि यहाँ सोचता हूँ मैं

किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ


ग़म दिल में लेके जी रहा हूँ ज़िंदगी हर पल 

ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं या ग़म शुदा कहूँ


लोगों के तजस्सुस पे अपनी उम्र क्या कहूँ 

कितना मैं जी चुका हूँ या कितना मरा कहूँ


ज़ाहिर’ तलाशता है कोई ख़ुद सा अजनबी

अब कब तलक मैं आईने को ही बुरा कहूँ 


Wednesday, February 12, 2025

दिन आ रहे हैं


क़रीबी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

हवा मीठी मीठी गुलाबी गुलाबी
मुहब्बत जताने के दिन आ रहे हैं

अभी जिनको उड़ने की न हो इजाज़त
तो पर फड़ फड़ाने के दिन आ रहे हैं

लिखे शेर जो रात दिन जिनकी ख़ातिर
वो पढ़ने पढ़ाने के दिन आ रहे हैं

उन्हें जो सुना हो कभी गुनगुनाते
वो गाने बजाने के दिन आ रहे हैं

जो रूठे हुए हैं बिना बात के ही
उन्हें फिर मनाने के दिन आ रहे हैं

है ठंडी हवा धूप भी बढ़ रही है
कबूतर उड़ाने के दिन आ रहे हैं

कोई दोस्त हों या पडोसी तुम्हारे
सभी को जलाने के दिन आ रहे हैं

नज़र जो चुराते थे अब तक उन्हीं से
तो नज़रें मिलाने के दिन आ रहे हैं

कहीं तन्हा बैठे अकेले अकेले
यूँही बड़बड़ाने के दिन आ रहे हैं

कहीं कोई लैला न मिल जाए 'ज़ाहिर'
ये दाढ़ी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं

आहट

दिल तरसता है किसी रोज़ की आहट के लिए
मुद्दतों से हूँ परेशान मैं राहत के लिए

चश्म-ए-साक़ी की निगाहों में ख़ुशी की ख़ातिर
फूल चुनता हूँ लगाता हूँ सजावट के लिए

ख़ाब सच करने को मिलना था मुझे भी उनसे
और मिलना भी था 'ज़ाहिर' है मलामत के लिए

ख़ुशबू-ए-दिल की महक आती है मेरे घर से 
रूह जलती है महकती है इबादत के लिए

दिल को तालीम दिलाता हूँ डुबा कर खुद में
नींव गहरी हो ज़रूरी है इमारत के लिये

वो नहीं आये न आएंगे मुझे लगता है
क्या उनका आना ज़रूरी है मोहब्बत के लिए?

Tuesday, February 11, 2025

कोई पागल समझता है

असली शायर: कुमार विश्वास 

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
कोई ठोकर से है मुझको हुआ घायल समझता है
मैं घायल जानता हूँ हूँ मैं दीवाना मैं पागल हूँ
मगर दीवाना क्यों घायल है ये पागल समझता है

ये लड्डू है बना घी से तभी ये टेढ़ा मेढ़ा है
मगर तू हाय क्यों जाने इसे मगदल समझता है

कहाँ किस रासते आती है जाड़ों में किनारों से 
हवा घुसती कहाँ से है तेरा कंबल समझता है

कभी दिल्ली का बाशिंदा चला जाता है गर ऊटी
तमिल नाडू को बेचारा हरा केरल समझता है

मेरे बाबा जो कहते थे वो सहगल और है कोई 
मेरा बेटा किसी रैपर को ही सहगल समझता है

दिखाकर और सिखाकर भी किसी को कुछ नहीं समझा 
मगर 'ज़ाहिर' तो आँखों के हर इक सिग्नल समझता है

कभी भी छोड़ना मत अपनी माँ का पाक सा पल्लू
ये तेरा आसमाँ है जिसको तू आँचल समझता है
(आस माँ की आसमाँ है जिसे आँचल समझता है )

और भी हैं

असली शायर: अल्लामा इक़बाल 


निगाहों परे आसमाँ और भी हैं 

यहीं इक नहीं आशियाँ और भी हैं 

है सर पे फ़लक हैं फ़लक पे सितारे 

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं 


नहीं तू सही, तू नहीं इक सहारा 

मेरे हुस्न के कद्रदाँ और भी हैं 


किसी इक ज़बाँ की नहीं मिल्कियत तू  

मोहब्बत तेरे हम ज़ुबाँ और भी हैं


गुनाहों की बातें ज़रा रुक के सुनना 

मेरे दोस्तों के बयाँ और भी हैं


है फ़ेहरिस्त लंबी यही बस नहीं है 

मेरे नाम पे ग़लतियाँ और भी हैं 


क्या 'ज़ाहिर' सभी अश्क़ तुझपे लूटा दूँ 

अभी तुम चलो बे कुआँ और भी हैं 


ख़ुशी मत मनाना अगर बैठ जाऊँ

मेरे पास तीर-ओ-कमाँ और भी हैं 

Monday, February 10, 2025

देखता रह गया

असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी


आपको देख कर देखता रह गया

मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया 


वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे 

और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया 


ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में 

ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया


जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता 

जो नहीं मिल सका ला पता रह गया 


कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे

सोचते सोचते सोचता रह गया


दिल में इज़हार था और लब थे सिले 

सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया 


रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई 

देख ले अब खुला आसमा रह गया 


मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए

रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया

है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना 

पूछ दिल कितना पाक--सफ़ा रह गया

Sunday, February 9, 2025

सुख़न

आदमी ज़ोफ़-ए-तन देख सकता नहीं

रश्क अह्ल-ए-सुख़न देख सकता नहीं

है अना वो बला सर पे चढ़ जाये तो

पैरहन पैरहन देख सकता नहीं

[ज़ोफ़-ए-तन = weakness of body, रश्क = jealousy, अह्ल-ए-सुख़न = poet, अना = ego, पैरहन = clothes]


देखते हैं सभी आईना पर कोई

आइने की घुटन देख सकता नहीं


जो मुझे दिख रहा है यहाँ से अभी

कोई ये अंजुमन देख सकता नहीं

[अंजुमन = नज़ारा]


चाँद को अब्र ढँक ले तो क्या फिर कोई 

चाँदनी की किरन देख सकता नहीं?

[अब्र = बादल]


जो भी है बुत कदा और है ना ख़ुदा

वो मेरा फ़िक्र-ओ-फ़न देख सकता नहीं

[बुत कदा = जिसे सब कुछ पता हो, ना ख़ुदा = नास्तिक, फ़िक्र-ओ-फ़न = विचारों की कलाकारी]



जब से अपनों ने है मुझको रुख़सत किया 

मैं ये अपना बदन देख सकता नहीं

[रूखसत = see off ]


आइने को न जाने गुमा क्या हुआ

के वो मेरा दहन देख सकता नहीं

[गुमा = अहंकार, दहन = face]


मैंने पड़ने न दी अपने सर पे शिक़न

अब कफ़न पे शिक़न देख सकता नहीं


वाइज़ों ने सुनाई थी जो दास्ताँ

मैं वो 'ज़ाहिर' अदन देख सकता नहीं

[वाइज़ = उपदेश देने वाला, अदन = Beautiful/Eden, ज़ाहिर = is my pen name]


मैं दराज़ों का शायर नहीं हूँ मुड़े

काग़ज़ों पे सुख़न देख सकता नहीं

[सुख़न = कविता]


Friday, February 7, 2025

तेरा ख़याल

जब कभी तेरा ख़याल आता है
जाने क्या दिल को हुआ जाता है

वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है
तू मेरे दिल में समा जाता है

ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को
तू सगा दिल को नज़र आता है

धड़कनें रफ़्त हैं मेरे दिल की
मैं हूँ ज़िंदा ये यक़ीं आता है

इक दफ़ा मेरी तरफ़ भी देखो
क्या तेरा इसमें चला जाता है

Wednesday, February 5, 2025

टहनी

बात कहने को बात कहनी थी
जो अनकही थी दिल में रहनी थी

बोझ कैसे उतरता दिल का भला
दिल कि बातें न थी वो ज़हनी थी

गिर गई वो चलो अच्छा ही हुआ
वो इमारत कभी तो ढहनी थी

ख़ुद को अब भी मेरा बताने को
उसने मेरी ही शाल पहनी थी

जाने कैसे हुआ पलट क्यूँ गई
जो हवा मेरी ओर बहनी थी

उससे वा बस्त होके 'ज़ाहिर' था
तंज़ ओ फ़िक्रों की बात सहनी थी

फूल तूफ़ान आ के लेके गया
बच गई सिर्फ़ एक टहनी थी

Sunday, February 2, 2025

देखा

उसके जाने का ये असर देखा
आज वीरान अपना घर देखा
डूबता ही चला गया, जब से 
उसकी आँखों में अपना दर देखा 

उसकी महफ़िल में पारा पारा थे
उसकी मुझपर ही थी नज़र, देखा?

अक्स आईने में मेरा जो दिखा
उसने फिर ख़ुद को देखकर देखा

बात आगे न की के मैंने तुझे  
बात करता अगर मगर देखा 

मैं तो बिलकुल से उसका पूरा था 
उसने तो बस मेरा हो कर देखा 

मैं उजड़ के बिखर न जाऊँ कहीं
उसकी आँखों में मैंने डर देखा

शौक़ 'ज़ाहिर' था लौट कर देखूँ
हूक का मैंने फिर भँवर देखा

उससे मिलना था ख़ाब मेरे लिये
ख़ाब में उसको रात भर देखा

इज़्ज़त

Matlaa:

इस दुनिया में सबको अपनी कुछ बात सुनानी होती है 

रस्ते की कहानी है तो कहीं मंज़िल की निशानी होती है 


बाज़ारी हो चेहरे की चमक या हो हाथों में फ़ोन नया 

आपा धापी की दुनिया में औक़ात दिखानी होती है 


शहरों की गर्दी में अपने अंदर क्या खून बचाओगे 

जीवन की गाड़ी भी अब तो पानी से चलानी होती है 

[गर्दी = revolution/क्रांति]


दुनिया वाले इक दूजे की दुनिया तो उजाड़े देते हैं 

और फिर अपनी उजड़ी दुनिया ख़ुद को ही बसानी होती है 


ये उम्र तमाशा है इसमें बचपन से है बूढ़ा होना 

देखे दुनिया जिस मंज़र को अक्सर वो जवानी होती है 


ये प्यार भी क्या है बला भला कैसी यादें दे जाता है 

दिल पर जो दाग़ रहे वो ही दिलबर की निशानी होती है 


है क़र्ज़ सभी के माथे पर तो फ़र्ज़ कोई क्या पालेगा 

अपने काँधे पर ख़ुद अपनी ही लाश उठानी होती है 


Maqtaa: (Takhallus - 'Zaahir')

होता ही नहीं है शहरों में तो वक़्त कहाँ से लाओगे 

ख़ुद से ही 'ज़ाहिर' है ख़ुद को आवाज़ लगानी होती है 


इज़्ज़त की बातें रहने दो अब नहीं ज़माना इज़्ज़त का 

बोहतों को कार गुज़ारिश में इज़्ज़त ही गँवानी होती है 

[कार गुज़ारिश = request for work]

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...