Friday, June 7, 2024

ईंधन

एक संत एकांत सजावत
हूँ का परिचय ढूँढत है
ज्यों परिचय की परत उघारत 
फिर फिर अखियाँ मूँदत है 

ना तन ना मन ना जग चिंतन 
हूँ का रूप ना पूरत है
ना है सत देखे जो दर्पण 
ना सत आपन मूरत है 

तात मात ना पुत्र ना पुत्री 
ना है मरद ना औरत है 
बिधी धारत छाड़त ढूँढन की 
हूँ तो प्रगट ना होवत है 

मानुस पंछी जन्तु सब ही 
घट है घट घट जीवन है
घट चालत जाके कारण वह 
कवन न जानत ईंधन है 

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