Thursday, June 6, 2024

मेरा जनाज़ा

खुली जो आँख तो धुंधला सा इक नज़ारा था 

इक नये नाम से किसी ने तो पुकारा था 


कौन हूँ मैं ये शायद मुझे मालूम था तब 

सामने मेरे मगर दस्तूर का निवाला था 


कोई तल्ख़ी ना थी मुझको कोई रंजिश भी ना थी 

इनसे वाक़िफ़ हुआ जब आईना सम्भाला था 


मेरी चाहत ना थी कुछ ना ही आरज़ू थी कोई 

इस ज़माने ने मुझे जान के बिगाड़ा था 


बेतुकी बात है लेकिन ये रात ख़्वाबों में 

देखा कांधों पे मेरे ख़ुद मेरा जनाज़ा था 

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