ख़ुमार-ए-इश्क़ देख कैसे दिल पे छाता है
बुख़ार है ये यहाँ हर किसी को आता है
मरीज़ खोज भी लेता हो गर दवा की खुराक
मर्ज़ है के वो तो बढ़ता ही चला जाता है
जो मिल सकी न दवा तो मरीज़ की जानिब
हक़ीम की तरहा कोई रक़ीब आता है
वो जाएदाद समझ कर बेवक़ूफ़ी से
मरीज़ के ही मर्ज़ को ख़रीद जाता है
ये वारदात चाहतों की ज़बां बंदी है
जवाँ दिलों के धड़कनों की रज़ा मंदी है
ये वो आफत है, वो मुश्किल है जहां हर दिल जवाँ
अपने हाथों से खुद को हथकड़ी लगाता है
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