भीनी सी सौंधी हवा है
मन को जो महका रही है
बोझिल सी साँसों को मेरी
हौले से बहला रही है
सूरज की किरणों को छूकर
खिल जाए बाग़ों की कलियाँ
जज़्बों को मेरे जगाकर
महके इरादों की गलियाँ
दिलकश हवाएं भी इजहार से
गुलशन को लहका रही हैं || भीनी सी सौंधी हवा है
क़ुदरत बनाती है नग़मे
पंछी उसे गुनगुनाते
मदहोश करता है आलम
धुन ये सुनाते सुनाते
बादल की लड़ियाँ आकाश के
नज़ारों में इठला रही हैं
भीनी सी सौंधी हवा है
मन को जो महका रही है
बोझिल सी साँसों को मेरी
हौले से बहला रही है
-- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे
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