Monday, March 4, 2024

आजकल

मिलता हूँ इक अजीब शक्सियत से आजकल 
होता हूँ रू-ब-रू मैं हक़ीक़त से आजकल
कहता तो कुछ नहीं है मुझे देखता है वो
शायद मेरी हरकत से है उदास आजकल 

है कौन आईने में मुझसे चाहता है क्या 
चलता नहीं कुछ मेरी इजाज़त से आजकल 

जब देखता हूँ उसको तो नज़रें वो झुका ले 
लगता है के शर्मिंदा बोहोत है वो आजकल 

उसने ये सिखाया के सफर बे-हिसाब है 
मिलता है सुकूँ आज में रहने से आजकल 

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