Tuesday, March 12, 2024

शायर के ख़्वाब

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

दिन रात आप की ही बात सोचते हैं हम 
शुरुआत कैसे की थी हमने एहतराम से 

काग़ज़ पे चार हर्फ़ ही क्या लिख दिए मैंने 
साँसे तेरी रुक सी गई मेरे कलाम से 

तेरा घडी-घडी घडी की ओर देखना 
और याद है बिगड़ना तेरा मेरे नाम से 

हमको भी याद हैं वो तेरे ख़ास बहाने 
कुछ काम ज़रूरी से ज़रूरी थे शाम से 

हंसना तेरा रोना तेरा कनखी से देखना 
और कहना ये के काम रखिये अपने काम से 

वो वक़्त तो यादों की शक्ल याद रहेंगे 
वो दिन नहीं आने अभी कितने भी दाम से 

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

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