गुफ़्तगू में तेरी बारी मेरी बारी से कम है क्या
मैं जैसे जी रहा हूँ ये कलाकारी से कम है क्या
न मतलब पूछ तू मुझसे बे वझा क्यों झगड़ते हो
दिलों के बीच की बातें रिश्तेदारी से कम है क्या
मेरा क़ातिल मेरे ही घर खून मेरा कर रहा हो
मेरा ये फिर भी चुप रहना वफ़ादारी से कम है क्या
किसी भी बात में लफ़्ज़ों का होना तो मुनासिब है
बिना लफ़्ज़ों के फ़रमाना समझदारी से कम है क्या
ज़रा देखूं तो पर्दों से ज़रा हट के तुझे भी मैं
तेरे आँखों की मुस्कानें अदाकारी से कम हैं क्या
वो कहते हैं नहीं रहते हैं पर्दों में कभी लेकिन
निगाहों पे पड़ी ज़ुल्फ़ें पर्देदारी से कम है क्या
न पूछो क्या हुआ है मर्ज़ हमको क्या अलालत है
तेरी ही धुन में फिरते हैं ये बीमारी से कम है क्या
फ़िज़ाओं में तेरी खुशबू ज़हन में तुम ही रहते हो
अकेला दिल धड़कता है ये लाचारी से कम है क्या
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