वो भी क्या दिन थे ज़िन्दगी के मेरे
गीत तेरे ही गुनगुनाते थे
तुम ही दीखते थे महफिलों में मुझे
सब तेरे नाम से बुलाते थे
किस तरह दिन बरस ये बीत गए
रात दिन कैसे आते जाते थे
कुछ समझ पाता दिल तो कहते तुझे
वक़्त को कैसे हम भुलाते थे
जब कभी नाम तेरा सुनते थे
ज़िद की हद को आज़माते थे
रोक लेते थे मुस्कुरा के उन्हें
अश्क़ आँखों तलक तो आते थे
इक तमाशा सा देखने के लिए
दोस्त मौसम की तरह आते थे
हमसे उम्मीद कर के रोने की
बेवझा हँसते और हंसाते थे
कोई तारा जो टूटता था कभी
आस सी दिल को हम दिलाते थे
प्यास आँखों की फिर भी रुक ना सकी
कितने आंसू इसे पिलाते थे
आसमानों में ये कहानी है
ग़म तेरे कैसे हम मिटाते थे
परवरिश दिन की जब तमाम हुई
रात को रात भर सुलाते थे
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