Monday, March 25, 2024

रात

वो भी क्या दिन थे ज़िन्दगी के मेरे 
गीत तेरे ही गुनगुनाते थे 
तुम ही दीखते थे महफिलों में मुझे 
सब तेरे नाम से बुलाते थे 

किस तरह दिन बरस ये बीत गए 
रात दिन कैसे आते जाते थे 
कुछ समझ पाता दिल तो कहते तुझे 
वक़्त को कैसे हम भुलाते थे 

जब कभी नाम तेरा सुनते थे 
ज़िद की हद को आज़माते थे 
रोक लेते थे मुस्कुरा के उन्हें 
अश्क़ आँखों तलक तो आते थे 

इक तमाशा सा देखने के लिए 
दोस्त मौसम की तरह आते थे 
हमसे उम्मीद कर के रोने की 
बेवझा हँसते और हंसाते थे 

कोई तारा जो टूटता था कभी 
आस सी दिल को हम दिलाते थे 
प्यास आँखों की फिर भी रुक ना सकी
कितने आंसू इसे पिलाते थे 

आसमानों में ये कहानी है 
ग़म तेरे कैसे हम मिटाते थे 
परवरिश दिन की जब तमाम हुई 
रात को रात भर सुलाते थे 

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