Thursday, February 27, 2025

ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

सुबह थी कल, आज दिन, कल शाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

गुल नहीं बचता अगर गुल्फ़ाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

हर किसी के सर अधूरा काम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

नाम अपना है मगर बदनाम है 
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

साँस देती रूह को पैग़ाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

टूटना हर ख़ाब का अंजाम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

हादसों से सीखना ईनाम है 
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

ज़ेह्न को 'ज़ाहिर' कहाँ आराम है
ज़िन्दगी शायद इसी का नाम है

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