दिल तरसता है किसी रोज़ की आहट के लिए
मुद्दतों से हूँ परेशान मैं राहत के लिए
चश्म-ए-साक़ी की निगाहों में ख़ुशी की ख़ातिर
फूल चुनता हूँ लगाता हूँ सजावट के लिए
ख़ाब सच करने को मिलना था मुझे भी उनसे
और मिलना भी था 'ज़ाहिर' है मलामत के लिए
ख़ुशबू-ए-दिल की महक आती है मेरे घर से
रूह जलती है महकती है इबादत के लिए
दिल को तालीम दिलाता हूँ डुबा कर खुद में
नींव गहरी हो ज़रूरी है इमारत के लिये
वो नहीं आये न आएंगे मुझे लगता है
क्या उनका आना ज़रूरी है मोहब्बत के लिए?
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