Sunday, February 2, 2025

इज़्ज़त

Matlaa:

इस दुनिया में सबको अपनी कुछ बात सुनानी होती है 

रस्ते की कहानी है तो कहीं मंज़िल की निशानी होती है 


बाज़ारी हो चेहरे की चमक या हो हाथों में फ़ोन नया 

आपा धापी की दुनिया में औक़ात दिखानी होती है 


शहरों की गर्दी में अपने अंदर क्या खून बचाओगे 

जीवन की गाड़ी भी अब तो पानी से चलानी होती है 

[गर्दी = revolution/क्रांति]


दुनिया वाले इक दूजे की दुनिया तो उजाड़े देते हैं 

और फिर अपनी उजड़ी दुनिया ख़ुद को ही बसानी होती है 


ये उम्र तमाशा है इसमें बचपन से है बूढ़ा होना 

देखे दुनिया जिस मंज़र को अक्सर वो जवानी होती है 


ये प्यार भी क्या है बला भला कैसी यादें दे जाता है 

दिल पर जो दाग़ रहे वो ही दिलबर की निशानी होती है 


है क़र्ज़ सभी के माथे पर तो फ़र्ज़ कोई क्या पालेगा 

अपने काँधे पर ख़ुद अपनी ही लाश उठानी होती है 


Maqtaa: (Takhallus - 'Zaahir')

होता ही नहीं है शहरों में तो वक़्त कहाँ से लाओगे 

ख़ुद से ही 'ज़ाहिर' है ख़ुद को आवाज़ लगानी होती है 


इज़्ज़त की बातें रहने दो अब नहीं ज़माना इज़्ज़त का 

बोहतों को कार गुज़ारिश में इज़्ज़त ही गँवानी होती है 

[कार गुज़ारिश = request for work]

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