ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी
तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी
मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं 'ज़ाहिर' तुझ को
जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर है ये मेरी ख़ामोशी
बात कहने से तो चुक जाती हैं सारी बातें
मेरी बातों में अमर है ये मेरी ख़ामोशी
बे ख़याली तो नहीं होती न कुछ कहने से
तो ख़यालों का शजर है ये मेरी ख़ामोशी
फिर भी ये शोर जो रुकता तो ज़हन सो लेता
सोचता हूँ के किधर है ये मेरी ख़ामोशी
शाम 'ज़ाहिर' कि लिए जाम गुज़र जाती है
इस गुज़र में ही बसर है ये मेरी ख़ामोशी
बुत तराशी जो किया करती है दुनिया मेरी
देती दुनिया को सिफ़र है ये मेरी ख़ामोशी
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