सब चाहते हैं मैं भी तुझे बेवफ़ा कहूँ
पर मैं ये चाहता हूँ तुझे शुक्रिया कहूँ
घिस पिट चुके हैं सारे मलामत के पैंतरे
सोचा तुझे मैं जाते हुए कुछ नया कहूँ
पा के जो खो दिया उसे क़िस्मत सा कह दिया
खो के जो पा लिया मैं उसे फ़लसफ़ा कहूँ
दिल डूबता है तेरे ख़यालों में रात दिन
तुझको नहीं तो और किसे दिलरुबा कहूँ
इतने हैं रहनुमा कि यहाँ सोचता हूँ मैं
किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ
ग़म दिल में लेके जी रहा हूँ ज़िंदगी हर पल
ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं या ग़म शुदा कहूँ
लोगों के तजस्सुस पे अपनी उम्र क्या कहूँ
कितना मैं जी चुका हूँ या कितना मरा कहूँ
‘ज़ाहिर’ तलाशता है कोई ख़ुद सा अजनबी
अब कब तलक मैं आईने को ही बुरा कहूँ
No comments:
Post a Comment