Thursday, February 13, 2025

क्या कहूँ

सब चाहते हैं मैं भी तुझे बेवफ़ा कहूँ

पर मैं ये चाहता हूँ तुझे शुक्रिया कहूँ


घिस पिट चुके हैं सारे मलामत के पैंतरे

सोचा तुझे मैं जाते हुए कुछ नया कहूँ


पा के जो खो दिया उसे क़िस्मत सा कह दिया 
खो के जो पा लिया मैं उसे फ़लसफ़ा कहूँ

दिल डूबता है तेरे ख़यालों में रात दिन 
तुझको नहीं तो और किसे दिलरुबा कहूँ

इतने हैं रहनुमा कि यहाँ सोचता हूँ मैं

किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ


ग़म दिल में लेके जी रहा हूँ ज़िंदगी हर पल 

ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं या ग़म शुदा कहूँ


लोगों के तजस्सुस पे अपनी उम्र क्या कहूँ 

कितना मैं जी चुका हूँ या कितना मरा कहूँ


ज़ाहिर’ तलाशता है कोई ख़ुद सा अजनबी

अब कब तलक मैं आईने को ही बुरा कहूँ 


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