असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी
आपको देख कर देखता रह गया
मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया
वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे
और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया
ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में
ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया
जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता
जो नहीं मिल सका ला पता रह गया
कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे
सोचते सोचते सोचता रह गया
दिल में इज़हार था और लब थे सिले
सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया
रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई
देख ले अब खुला आसमा रह गया
मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए
रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया
है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना
पूछ दिल कितना पाक-ओ-सफ़ा रह गया
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