Sunday, December 15, 2024

खुदगर्ज़

इन्साफ़ ज़ुल्म को जो कभी तोलता न हो
जो देख ले कभी तो ज़ुबाँ खोलता न हो
खुदगर्ज़ कितना है ये जो इंसान सोचना
ऐसा ख़ुदा बनाया के जो बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

दिन रात खेत में जो पसीने से तर हुआ
उसको कोई मिला नहीं जो मोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

बच्चों कि बात तब हि तलक रास आती है
जब तक वो अपनी बात सफ़ा बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

हमराज़ वो ही आखरी दम तक जो कारगर
मर जाए अपने राज़ कहीं खोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...

इन्साफ करे ऐसा कोई भी नहीं मिला 
ग़म और ख़ुशी जो एक साथ घोलता न हो ||

'ज़ाहिर' कभी हुआ ही नहीं शर्तिया यहाँ  
कोयल सी हो आवाज़ मगर वो लता न हो || 

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