ये कैसा अजब इश्तिहारी जहाँ है
जो देखा सुना है उसी का धुआँ है
मैं तन्हाइयों में यही सोचता हूँ
मेरी चाहतें मेरी खुद की कहाँ है
सरे सेहरा दरिया निकल आ रहा है
कोई तो बता दे ये क्या हो रहा है
ऋषि केश काबा गया या बनारस
जहाँ किसको ढूँढे वो मिलता कहाँ है
मोहब्बत है गूंगे को कातिल से 'ज़ाहिर'
करे क्या के बेचारा ख़ुद बेज़ुबाँ है
ढिंढोरा पिटा है ख़ुदा तेरी ख़ातिर
फ़रेबी जहाँ की ग़ज़ब इंतिहाँ है
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