हम तो हुए नहीं थे तुमसे ख़फ़ा कभी
किस बात का लगा है मजमा यहाँ अभी
हम आज भी वही हैं ख़ामोश दिल की सुन
आवाज़ आ रही है दिल से दबी दबी
पेहचान तुझसे कोई माना कभी न थी
लगते हो फिर भी मेरे मेहरम कभी कभी
खुशबू को तो नवाज़िश तुमसे न मिल सकी
आएगी पास तेरे फिर भी कभी कभी
हर साँस में बिठाकर जीते हैं तुझको हम
रखते हो तुम भी हमको बेदम कभी कभी
नज़रें नहीं मिलाकर बेचैन करते हो
नज़रें मिला के कर दो बे ग़म कभी कभी
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