आँखों का धोखा है बस कुछ और नहीं
ऐसा क्या है तुम में जो कि बदल गया
मूँदो अपनी आँखें ख़ुद से बात करो
क्या सच में कुछ ऐसा है जो बदल गया
धूल है बस मिट्टी की उड़ कर बादल सी
छा जाती है दिन में शाम सी लगती है
हम तुम देख के सोच के फिर ये कहते हैं
ऐसा लगता है कि कुछ तो बदल गया
फिर मिट्टी ख़ुद मिट्टी में मिल जाती है
सिलवट सी चादर पर पड़ने लगती है
आँखें बोझिल होकर सोने लगती हैं
फिर से लगता है कि सब कुछ बदल गया
आँखों का धोखा है बस कुछ और नहीं
ऐसा क्या है तुम में जो कि बदल गया
मूँदो अपनी आँखें ख़ुद से बात करो
क्या सच में कुछ ऐसा है जो बदल गया
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