ढलता सूरज चिल्लाता है
रातों का हुनर सब भूल गए
गाड़ी में अकेले फिरते हैं
छातों का हुनर सब भूल गए
गन्ना मिल में ही जाता है
दाँतों का हुनर सब भूल गए
वालिद माँ भाई ब्रो हैं अब
नातों का हुनर सब भूल गए
लहजे भी बदेसी ज़ाहिर है
बातों का हुनर सब भूल गए
अब क्रेडिट नोट ही चलता है
खातों का हुनर सब भूल गए
हुक़्मों की ताबीरें होंगी
हाथों का हुनर सब भूल गए
तारों की जमातों से सीखी
सातों का हुनर सब भूल गए
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