आज कल जाने वो क्यों छत पे टहलते ही नहीं
दिल में उनके कोई अरमान मचलते ही नहीं
हम इरादों से निकलते हैं मुलाक़ात तो हो
और बचने के इरादे वो बदलते ही नहीं
गुफ़्तगू दिल की करे कोई तो कैसे ही करे
वो तो दिल लेके कभी घर से निकलते ही नहीं
हम तो मजबूर हैं कुछ भी नहीं कहते लेकिन
आँख से प्यार के इज़हार संभलते ही नहीं
चाल शतरंज की तफ़सील से वो चलते हैं
और हम हैं कि कभी सोच के चलते ही नहीं
जो ढले हों कभी लावों की तपिश में ज़ाहिर
वो कभी धूप की गर्मी से पिघलते ही नहीं
ये दिए दिल के हैं ऐसे तो न होंगे रोशन
ये ज़माने में लगी आग से जलते ही नहीं
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