Monday, August 24, 2026

राम भजन

धियान न लागे मोरा राम 
का करूँ सोहे तोरा नाम 

गलियाँ फिरत हूँ चारों पहर अब 
तोरा नाम जपन मोरा काम 
धियान न लागे मोरा राम ...

जो सुख तोरे नाम में आवे 
इतनों कहीं कछु हूँ न सुहावे 
राम कहत है मन सन मोरा 
रकत हाड़ अरु चाम 
धियान न लागे मोरा राम ...

दुःख कछु नाहि सुख कछु नाही 
भरम है सबरे मानुस का ही 
लागी लगन अब मन को तिहारी 
तोरा मंदिर ही मोरा धाम 
धियान न लागे मोरा राम ...
 
आवत जावत खावत धावत 
करनी पर आपन पछतावत 
अनपढ़ मन बस समय गवावत 
भोर की हुई गई साम 
धियान न लागे मोरा राम ...

Saturday, August 22, 2026

अगर आईना न होता

छाता नहीं सुरूर अगर आईना न होता

चढ़ता नहीं फ़ितूर अगर आईना न होता 

सूरत न देखता न कमी देखता ख़ुदी में 

होता नहीं गुरूर अगर आईना न होता


कहने पे कोई बात कभी मेरे मुख़ालिफ़

गिनते नहीं कुसूर अगर आईना न होता 


होता नहीं रक़ीब कोई रश्क भी न होता 

होता नहीं मशूर अगर आईना न होता 


दिखता न कोई भेस बदल कर के आईने में 

सजती ही नहीं हूर 'अगर आईना न होता

Friday, August 21, 2026

क़ता

साँस दर साँस लिखा करते हैं
साँस दर साँस मिटा करते हैं
वक़्त को ज़िंदगी कि ख्वाहिश में 
मौत की किश्त अदा करते हैं

रोज़ करते हैं सराबी खुद को 
रोज़ कहते हैं वफ़ा करते हैं
भूल जाते हैं किए वादे भी
और फिर ख़ुद से गिला करते हैं 

Thursday, August 20, 2026

सब भूल गए

ढलता सूरज चिल्लाता है
रातों का हुनर सब भूल गए

गाड़ी में अकेले फिरते हैं 
छातों का हुनर सब भूल गए

गन्ना मिल में ही जाता है
दाँतों का हुनर सब भूल गए

वालिद माँ भाई ब्रो हैं अब 
नातों का हुनर सब भूल गए

लहजे भी बदेसी ज़ाहिर है
बातों का हुनर सब भूल गए

अब क्रेडिट नोट ही चलता है
खातों का हुनर सब भूल गए

हुक़्मों की ताबीरें होंगी 
हाथों का हुनर सब भूल गए

तारों की जमातों से सीखी 
सातों का हुनर सब भूल गए

Wednesday, August 19, 2026

ख़ुद गर्ज़

मैं आरज़ू मेरा अर्ज़ तुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

खामोशियाँ मैं हूँ लफ़्ज़ तुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

परवान मैं हूँ तो शम् अ' तुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

तेरा हूँ मैं मेरे भी तो तुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

मैं नाख़ुदा ज़ैर ए दस्त तुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

मैं तुझमें गुम हूँ तुम मुझमें गुम हो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो






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एक और कोशिश 
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मैं आरज़ू मेरा अर्ज़ तुम हो
खमोशियाँ मैं हूँ लफ़्ज़ तुम हो
हैं एक दूजे के काम आते 
मैं हूँ दवा मेरा मर्ज़ तुम हो

मैं नाख़ुदा ज़ैर ए दस्त तुम हो
मैं सिर जहाँ का तुम उसकी दुम हो 
गिला गुज़ारी ख़ता शियारी 
ना तुझसे मैं हूँ ना मुझसे तुम हो 

तेरा हूँ
मैं मेरे भी तो तुम हो
मैं तुझमें गुम हूँ तुम मुझमें गुम हो
परवान शम् अ' की तर्ह ही तो
ख़ुद गर्ज़ मैं हूँ ख़ुद गर्ज़ तुम हो

Tuesday, August 18, 2026

धोखा है

आँखों का धोखा है बस कुछ और नहीं
ऐसा क्या है तुम में जो कि बदल गया
मूँदो अपनी आँखें ख़ुद से बात करो
क्या सच में कुछ ऐसा है जो बदल गया 

धूल है बस मिट्टी की उड़ कर बादल सी
छा जाती है दिन में शाम सी लगती है
हम तुम देख के सोच के फिर ये कहते हैं 
ऐसा लगता है कि कुछ तो बदल गया

फिर मिट्टी ख़ुद मिट्टी में मिल जाती है
सिलवट सी चादर पर पड़ने लगती है
आँखें बोझिल होकर सोने लगती हैं
फिर से लगता है कि सब कुछ बदल गया

आँखों का धोखा है बस कुछ और नहीं
ऐसा क्या है तुम में जो कि बदल गया
मूँदो अपनी आँखें ख़ुद से बात करो
क्या सच में कुछ ऐसा है जो बदल गया 

वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो

और कितना काम बाक़ी है पड़ा 
वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो 

उम्र भर है कौन रह पाया खड़ा 
वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो 

कौन कितने गर्त में जाकर गड़ा 
वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो 

आज छोटा है जो वो भी था बड़ा 
वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो 

वो न जीता आख़िरी तक जो लड़ा 
वक्त के काँटे से जाकर पूछ लो

Friday, August 14, 2026

नींद

लब-ए-ख़ामोश की बातों से नींद आति नहीं 
दिल के बेचैन इशारों से नींद आति नहीं

रेत हाथों से फ़िसलती है वक़्त की तरह 
होश खोने के ख़यालों से नींद आति नहीं

वक़्त देता हो इजाज़त तो ख़ाब आते हैं 
ख़ाब आने को अभी हों तो नींद आति नहीं

बात करनी थी किसी से तो ख़ुद से ही कर ली 
ख़ुद से बातें न करूँ तो भि नींद आति नहीं

नींद आ जाए अगर लौट कर ख़यालों से
तो ख़यालों के ख़यालों से नींद आति नहीं

राह तकते ग़म ए हस्ती के शौक़ कैसे हैं
मौत ख्वाहिश है मगर दिल को नींद आति नहीं
[ग़म ए हस्ती = जीवन के दुःख, pains and worries of life]

क्या कहूँगा मैं अगर वो कहीं मिले मुझसे  
ख़ौफ़ इतना है कि सोचूँ तो नींद आति नहीं

क्या वो माज़ी है तेरा या वो दग़ा दे के गया  
कौन सी बात पे ज़ाहिर को नींद आति नहीं
[अज़र = excuse, बहाने , ज़ाहिर = my pen name]

दोऽस्ति करके वो दुश्मन का साथ देता है
वो दगाबाज़ है उसको भि नींद आति नहीं

क्यों परेशान हो ज़ाहिर कि नींद आ जाए
सबको सोने के बाद भी तो नींद आति नहीं
 

Saturday, August 8, 2026

एक दूजे के लिए

काश मिलने के इरादे कभी टलते ही नहीं
साथ हम छोड़ कभी राह बदलते ही नहीं

पर तरसने के लिए हम न जुदा होते तो
एक दूजे के लिए फिर से मचलते ही नहीं

धूप आँधी यूँ न मिलती जो कभी राहों में
बाग़ अपने कभी यूँ फूलते फलते ही नहीं

तय किया था चलो कुछ भी न कहेंगे लेकिन
दिल में ये प्यार के जज़्बात संभलते ही नहीं

राज़ दुनिया को हमारा ये बता या किसने
हम तो दिल लेके कभी घर से निकलते ही नहीं

प्यार ज़ाहिर है न होता तो सरे आम कभी
रहबरी को दिए राहों में ये जलते ही नहीं


Friday, August 7, 2026

अरमान

आज कल जाने वो क्यों छत पे टहलते ही नहीं
दिल में उनके कोई अरमान मचलते ही नहीं


हम इरादों से निकलते हैं मुलाक़ात तो हो
और बचने के इरादे वो बदलते ही नहीं

गुफ़्तगू दिल की करे कोई तो कैसे ही करे
वो तो दिल लेके कभी घर से निकलते ही नहीं

हम तो मजबूर हैं कुछ भी नहीं कहते लेकिन
आँख से प्यार के इज़हार संभलते ही नहीं

चाल शतरंज की तफ़सील से वो चलते हैं
और हम हैं कि कभी सोच के चलते ही नहीं

जो ढले हों कभी लावों की तपिश में ज़ाहिर 
वो कभी धूप की गर्मी से पिघलते ही नहीं

ये दिए दिल के हैं ऐसे तो न होंगे रोशन
ये ज़माने में लगी आग से जलते ही नहीं

राम भजन

धियान न लागे मोरा राम  का करूँ सोहे तोरा नाम  गलियाँ फिरत हूँ चारों पहर अब  तोरा नाम जपन मोरा काम  धियान न लागे मोरा राम ... जो सुख तोरे नाम...