लब-ए-ख़ामोश की बातों से नींद आति नहीं
दिल के बेचैन इशारों से नींद आति नहीं
रेत हाथों से फ़िसलती है वक़्त की तरह
होश खोने के ख़यालों से नींद आति नहीं
वक़्त देता हो इजाज़त तो ख़ाब आते हैं
ख़ाब आने को अभी हों तो नींद आति नहीं
बात करनी थी किसी से तो ख़ुद से ही कर ली
ख़ुद से बातें न करूँ तो भि नींद आति नहीं
नींद आ जाए अगर लौट कर ख़यालों से
तो ख़यालों के ख़यालों से नींद आति नहीं
राह तकते ग़म ए हस्ती के शौक़ कैसे हैं
मौत ख्वाहिश है मगर दिल को नींद आति नहीं
[ग़म ए हस्ती = जीवन के दुःख, pains and worries of life]
क्या कहूँगा मैं अगर वो कहीं मिले मुझसे
ख़ौफ़ इतना है कि सोचूँ तो नींद आति नहीं
क्या वो माज़ी है तेरा या वो दग़ा दे के गया
कौन सी बात पे ज़ाहिर को नींद आति नहीं
[अज़र = excuse, बहाने , ज़ाहिर = my pen name]
दोऽस्ति करके वो दुश्मन का साथ देता है
वो दगाबाज़ है उसको भि नींद आति नहीं
क्यों परेशान हो ज़ाहिर कि नींद आ जाए
सबको सोने के बाद भी तो नींद आति नहीं
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