साँस दर साँस लिखा करते हैं
साँस दर साँस मिटा करते हैं
वक़्त को ज़िंदगी कि ख्वाहिश में
मौत की किश्त अदा करते हैं
रोज़ करते हैं सराबी खुद को
रोज़ कहते हैं वफ़ा करते हैं
भूल जाते हैं किए वादे भी
और फिर ख़ुद से गिला करते हैं
धियान न लागे मोरा राम का करूँ सोहे तोरा नाम गलियाँ फिरत हूँ चारों पहर अब तोरा नाम जपन मोरा काम धियान न लागे मोरा राम ... जो सुख तोरे नाम...
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