Friday, August 21, 2026

क़ता

साँस दर साँस लिखा करते हैं
साँस दर साँस मिटा करते हैं
वक़्त को ज़िंदगी कि ख्वाहिश में 
मौत की किश्त अदा करते हैं

रोज़ करते हैं सराबी खुद को 
रोज़ कहते हैं वफ़ा करते हैं
भूल जाते हैं किए वादे भी
और फिर ख़ुद से गिला करते हैं 

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