Monday, November 4, 2024

अँधेरा

अँधेरा है अँधेरा 
अँधेरा है अँधेरा 
अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 
उजाला बेवफ़ा सा है कभी ज़्यादा कभी कम है 

अँधेरा दिन नहीं होता अँधेरी रात होती है 
उजाला देखने दिखलाने वाली ज़ात होती है 

अंधेरों में कोई ज़्यादा नहीं कोई कहीं कम है 
अंधेरों में न कोई तल्खी ना ही शोख परचम है 
 
न जाने ढूंढते फिरते हैं क्या सब इन उजालों में 
जवाबों की ख्वाहिशों में पड़े रहते सवालों में 

अँधेरे को मिटा दे ये चराग़ों में कहाँ दम है 
ये आबादी उजालों की अंधेरों से बोहोत कम है 

अंधेरों ने मुझे चुपके से कानों में बताया है 
के देखो इन उजालों ने हौसलों को चुराया है 

उजालों ने कहाँ किसको कभी जीना सिखाया है 
उजालों की चका चौंधों ने सबको बस रुलाया है 

उजालों ने ज़िन्दगी में सभी को अक्सर तोड़ा है 
अंधेरों ने कहीं चुपके से उनको फिर से जोड़ा है 

अँधेरा था अँधेरा है अँधेरा ही रहेगा 
उजाला जब भी थक जाए तो अँधेरा बहेगा 

अँधेरा है अँधेरा 
अँधेरा है अँधेरा 
अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 

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