अँधेरा है अँधेरा
अँधेरा है अँधेरा
अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है
उजाला बेवफ़ा सा है कभी ज़्यादा कभी कम है
अँधेरा दिन नहीं होता अँधेरी रात होती है
उजाला देखने दिखलाने वाली ज़ात होती है
अंधेरों में कोई ज़्यादा नहीं कोई कहीं कम है
अंधेरों में न कोई तल्खी ना ही शोख परचम है
न जाने ढूंढते फिरते हैं क्या सब इन उजालों में
जवाबों की ख्वाहिशों में पड़े रहते सवालों में
अँधेरे को मिटा दे ये चराग़ों में कहाँ दम है
ये आबादी उजालों की अंधेरों से बोहोत कम है
अंधेरों ने मुझे चुपके से कानों में बताया है
के देखो इन उजालों ने हौसलों को चुराया है
उजालों ने कहाँ किसको कभी जीना सिखाया है
उजालों की चका चौंधों ने सबको बस रुलाया है
उजालों ने ज़िन्दगी में सभी को अक्सर तोड़ा है
अंधेरों ने कहीं चुपके से उनको फिर से जोड़ा है
अँधेरा था अँधेरा है अँधेरा ही रहेगा
उजाला जब भी थक जाए तो अँधेरा बहेगा
अँधेरा है अँधेरा
अँधेरा है अँधेरा
अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है
No comments:
Post a Comment