Bahr: 122 122 122 122
समझते हैं हम सब जिसे एक सूरज
सितारे हैं वो बारी बारी चमकते
हर इक दिन नया इक सितारा फलक पे
कहाता है सूरज सरकते सरकते
मेरी नज़्र से उनको शिकवे बड़े हैं
तुम्हें तो कदर ही नहीं है मेरी अब
ये साड़ी ये झुमके ये काजल तो देखो
वो कहती है मुझसे सवरते सवरते
मेरे बाग़ का फूल इक दिन खिला था
बड़ा खूबसूरत बड़ा आब ओ ताबी
वो खुशबू से महका रहा था ये दुनिया
हवा में समाया बिखरते बिखरते
गुबारों की बस्ती संभाले हुए था
संभाले थे उसने सभी अपने रिश्ते
मगर एक दिन ऐसा फूटा वो बादल
बरस ही गया वो संभलते संभलते
ना जाने ये किस दिन का बदला है तेरा
परस्ती तेरी की अक़ीदत की खातिर
मैं जैसा था अब तो मैं वैसा नहीं हूँ
बदल ही गया हूँ बदलते बदलते
[परस्ती = Worship,अक़ीदत = Attachment ]
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