Bahr: 2222-2222-2222-22-2
सच को कहना लाज़िम है तो किसको तू सच कहता है
झूठ गला घोंटे तो सच फिर कब तक ज़िंदा रहता है
मेहनत करते करते खूं का क़तरा क़तरा जलता है
बाप मगर बच्चे की ज़िद को हँसते हँसते सहता है
जब तक दरिया सागर ना हो आवाज़ें ही करता है
सागर से मिलते ही देखो धीमे धीमे बहता है
जिस्म में रहती हैं रूहें पर रूह का सच भी कैसा है
खुद का कोई नाम नहीं है जिस्म को ही "मैं" कहता है
ये मैं हूँ मेरा घर है ये छाती ठोक के कहता है
इक दिन मालिक पूछेगा तू किसके घर में रहता है
No comments:
Post a Comment