Tuesday, November 19, 2024

जानवर

ये कौन है जो मुझको बांध बांध लाता है 
ये कौन है जो मुझको रोज़ बेच आता है
नफे की चाहतों में कौन यूँ दिवाना है 
ये कौन है जो मुझको केमिया खिलाता है 

ये किसने मुझको जंगलों से खैंच लाया है 
ये किसने बार बार ज़ुल्म मुझपे ढाया है 
ये कौन ब्रह्म ब्रह्म कहके ढोंग करता है 
ये कौन है जो रात दिन मुझे सताता है

ये कौन है जो अपने पाँव पे खड़ा नहीं 
ये कौन है जो मेरी जूतियाँ बनाता है 
निचोड़ कर के मेरी चर्बी खूब फूले है 
ये कौन झूठ मूठ माँ मुझे बुलाता है 

मैं सोचती हूँ सोचना इसे कब आएगा 
ये कब तलक यूँ होश में ही आ न पाएगा 
के कैसे बिन मेरे ये रात दिन गुज़ारेगा 
ये कर्ज कैसे मेरे दूध के उतारेगा 

मैं जानवर हूँ झूठ मूठ मुझको माँ ना कहो 
ये जो क़ुदरत है इसके साये तले तुम भी रहो 
ज़रा कोशिश तो करो खुद के दम पे जीने की 
अपनी बैसाखी बना तुम मुझे कुरबाँ ना करो 

है तुमसे एक गुज़ारिश ये मुझे कहने दो 
के मुझे धूप छाँव बर्फ खुद ही सहने दो 
मुझे नहीं हैं ख्वाहिशें तुम्हारे चौखट की 
मैं जानवर हूँ मुझे जानवर ही रहने दो 

No comments:

Post a Comment

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...