Bahr: 12122 12122
जिसे समझता था मैं सहारा
ये असलियत में तो वो नहीं है
जिसे समझता था मैं मोहब्बत
नहीं है सच में ये वो नहीं है
कहीं तो होगी रुहे रुमानी
जहाँ के तल्ख़ी बसी नहीं हो
मगर यहाँ के हरेक शय में
तो नफ़्ज़ परती भरी हुई है
कहीं तो हो इब्तिदा सुहानी
के जिसके अंजाम हों सुहाने
चराग़ी आँखें जला के देखी
मगर नहीं है कहीं नहीं है
पहाड़ झरना ये बहता पानी
सभी कि है इक सि ही कहानी
सभी को जीने की ख्वाहिशें हैं
सभी की नफ़्ज़ें दबी हुई हैं
न जाने है कौन सी निशानी
हैं ज़र्द के ज़र्द बिन कहानी
जो दिल ने चाहा था ज़िन्दगी से
जो खाब देखे ये वो नहीं हैं
है कौन बैठा मेरे ज़हन में
के जिसके मंसूबों से हूँ चलता
है क्या ज़हन में जो चाहता है
किसी को भी ना हो इत्मिनानी
सराब की सी है ज़िंदगानी
दिखे जो है ना दिखे नहीं है
यही बुढ़ापा यही जवानी
क़वाद हैं पर लिखे नहीं हैं
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