Sunday, November 17, 2024

क़वाद

Bahr: 
  • 12122
  • 12122

  • जिसे समझता था मैं सहारा 
    ये असलियत में तो वो नहीं है 
    जिसे समझता था मैं मोहब्बत 
    नहीं है सच में ये वो नहीं है 

    कहीं तो होगी रुहे रुमानी 
    जहाँ के तल्ख़ी बसी नहीं हो 
    मगर यहाँ के हरेक शय में 
    तो नफ़्ज़ परती भरी हुई है  

    कहीं तो हो इब्तिदा सुहानी 
    के जिसके अंजाम हों सुहाने 
    चराग़ी आँखें जला के देखी 
    मगर नहीं है कहीं नहीं है 

    पहाड़ झरना ये बहता पानी 
    सभी कि है इक सि ही कहानी 
    सभी को जीने की ख्वाहिशें हैं 
    सभी की नफ़्ज़ें दबी हुई हैं

    न जाने है कौन सी निशानी
    हैं ज़र्द के ज़र्द बिन कहानी
    जो दिल ने चाहा था ज़िन्दगी से
    जो खाब देखे ये वो नहीं हैं 

    है कौन बैठा मेरे ज़हन में 
    के जिसके मंसूबों से हूँ चलता 
    है क्या ज़हन में जो चाहता है 
    किसी को भी ना हो इत्मिनानी 

    सराब की सी है ज़िंदगानी
    दिखे जो है ना दिखे नहीं है 
    यही बुढ़ापा यही जवानी 
    क़वाद हैं पर लिखे नहीं हैं 
     

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