Sunday, August 25, 2024

इंसान-नीयत

बड़ी तक़लीफ करते हैं के अब बातें नहीं होंगी 
चिढ़ाते हैं के अब तुमसे मुलाक़ातें नहीं होंगी 
वो मुझसे पूछते हैं कब तुम आओगे पनाहों में 
वो क्या है के बिना तेरे तो बरसातें नहीं होंगी  

तेरी तफ़री की बातों का कोई सानी नहीं मिलता 
ये माना के तेरे बिन एक पत्ता भी नहीं हिलता 
मेरी आँखें चुरा कर तुझको हैरानी नहीं होगी   
तुझे महसूस कर लूँगा अगर आँखें नहीं होंगी 

अगर सांसें नहीं होती तो तुम भी क्या ही कर लेते 
सर ब सर लुत्फ ओ ताला ज़िंदगी की सर किधर लेते 
सवाल-ए-हिज्र पर देखो हाशिया ये हमारा है
के हम फिर रूह बन जाएंगे गर साँसें नहीं होंगी 

मंजिलों का पता उनको मिले जो रुक गए होंगे 
ज़हन और रूह में खुद की अभी मर चुक गए होंगे 
हमें परवाह कब थी रास्तों के बदगुमानी की   
नया रस्ता बना लेंगे अगर राहें नहीं होंगी 

सितारा है मेरा हमदम फ़लक से टिमटिमाता है 
मैं रुक जाता हूँ कह कर कुछ तो फिर वो सर हिलाता है
(वो कहता है)
रोशनी में हमेशा ही मुलाक़ातें नहीं होंगी 
गुफ़्तगू कर नहीं पाएंगे गर रातें नहीं होंगी 

जो ज़िंदा हैं जहां मे पेट अपना खुद चलाते हैं 
नज़र से जो नज़र मिलती है तो फिर मुसकुराते हैं 
ज़रा हम सोच लें इसपर, तो कुछ बातें नहीं होंगी 
भीख मँगे नहीं होंगे जो खैरातें नहीं होंगी 

हर तरफ बेक़रारी है हर तरफ बे गुज़ारी है 
मज़हबों का बहाना है बस यहाँ जाल साज़ी है 
हर तरफ देश में ये बे ग़रज़ ज़ातें नहीं होंगी  
साफ़ इंसान की नीयत जो हो लाशें नहीं होंगी 

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