सब है पराया रखना क्या है
ग़म हैं किसी के अपना क्या है
उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें
उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ
उम्र गुज़ारी तब जागा हूँ
सोते सोते उम्र गुज़ारी
नींदों में ही उम्र गुज़ारी
नींद उतारी उम्र गुज़ारी
अब समझा मैं सपना क्या है
दिल की बात उभर आएगी
इस मिट्टी में दफ़्ना क्या है
चलना था उसको इतना के
भूल गया वो थकना क्या है
दिल इतनी सी बात न समझे
यादों में कब रखना क्या है
जब रब है सबकी धड़कन में
तो फिर माला जपना क्या है
जब वादे ही टूट चुके हैं
तो फिर टूटा सपना क्या है
'ज़ाहिर' जब हम रुख़्सत होंगे
तब समझेगा अपना क्या है
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उनकी नशीली आँखें देखी
दिल ने पूछा चखना क्या है
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