Bahr (2122 122 1212 22)
याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा
तेरी मर्ज़ी न थी तक़दीर भी है शर्मिंदा
माना मुश्किल है मगर तू किसे बताएगा
लाज़मी है के नहीं छोर कोई चाहत के
क्या दबा के इन्हें रातों में तू सो पायेगा
बात बचकानी सी मासूमियत कि करते हो
चाह लोगे जिसे दिल से तुझे वो चाहेगा
एक दिन तू भी तो हो जाएगा ख़ुदा हाफ़िज़
कोई फिर तुझसा ही रोयेगा भूल जाएगा
याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा
तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा
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