जो तपन में से जल के कुंदनों सा आता है
दास्तानों में अपनी सरकशी सुनाता है
व हि तो है इक शाइर का ज़खीरा हम तो बस
मिसरे कुछ लिखे खुद हि खुद से आशिकी कर ली
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शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
मुझे भी तजरुबा करना था ज़ीस्त का मैंने
बड़ों के तालिमात-ओ-दर से ज़िन्दगी कर ली
खाब कल रात खेलता था राज़दारी मैं
छुपा के बात को रखना था वरना मेरी शह
और मुझे राज़ छुपाना भी नहीं आता था
तो ज़ुबान अपनी काट के ही बे-बसी कर ली
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
कोई तशख़ीस करे खुद की क्या मज़ाक़ है ये
हमने सुन रखा है इफ़रात दर्दनाक है ये
हमें ना जुर्म दिखा ना ही कोई खुद गरजी
हमने हर एक ग़म के घर की तलाशी कर ली
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
जो तजरुबों की तपन में से जल के आता है
बहर ग़ज़ल में अपनी सर कशी सुनाता है
वो ही शायर है असलियत में देख लो हम तो
दो एक शेर लिखे खुद से आशिक़ी कर ली
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
वो नसीहत भरे कलाम पढ़ा करता था
वो किसी से भी नहीं बस ख़ुदा से डरता था
जब उसे इल्म-ओ-नसीहत की बूझ आई तो
एक काफ़िर ने कलामों से बेरुखी कर ली
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
तो क्या हुआ जो हम ना हो सके किसी काबिल
तो क्या हुआ जो मिला है हमें ये मुस्तकबिल
ग़मों को मिल ना सका ग़म भरा माहौल यहाँ
तभी ग़मों ने सजाकर हमें खुशी कर ली
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली
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