Wednesday, October 16, 2024

साहब

Behr (2122 1122 1122 22)

सोचना जब भी क़दम कोई उठाना साहब
लौट के आता नहीं गुज़रा ज़माना साहब

फिर न पूछो के पता मेरा नहीं है कोई 
भूलने दो ना मुझे मेरा ठिकाना साहब 

कुछ मिला ही नहीं खाबों में उन्हें पाने से
अब तो बेहतर है उन्हें भूल ही जाना साहब

कुछ तो नग़मे हैं के जिनमें हैं सुहानी यादें
फिर चला देना मिरा गाना पुराना साहब

खुद मिली हो जो सज़ा याद कहाँ आती है
भूल जाता हूं ज़रा मुझको डराना साहब 

हैं निगाहें भरी महफ़िल में वजाहत पर ही
आप साहब हैं सभी ने ये कहा ना साहब

दो निवाले थे हमारी भी निगाहों में कभी 
पर अब अच्छा नहीं लगता है ये खाना साहब

मुझको आगे नहीं ला सकते हो तो मत लाना
कम से कम पीछे तो मुझको ना गिराना साहब
 
चोट लग सकती है शायर को ज़रा हौले से
इतना आसाँ नहीं कोई वज़्न गिराना साहब

No comments:

Post a Comment

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...