Friday, June 24, 2016

गाँव को गाँव रहने दो

ये दौलत की, दौड़ जो है, इसे शहरों में रहने दो |
कभी मिलने जो घर आओ दोस्त को यार कहने दो ||
फिरंगी चाल ढालों को घर तलक लेके जाते हो |
खुदा के वास्ते यारों गाँव को गाँव रहने दो ||

ये गाँव है जहाँ तेरी तबीयत पूछी जाती है |
कोई गलियों में मिलता है तो बेशक छींक आती है ||
बहाने से इसी यारों को मिलके बात करने दो |
खुदा के वास्ते यारों गाँव को गाँव रहने दो ||

शेहेर की गोरियाँ बेहद सभी को रास आती हैं |
मगर घर पे जो होती है वो माँ रोटी खिलाती है ||
शेहेर की गोरियों को तो शेहेर में वास करने दो |
खुदा के वास्ते यारों गाँव को गाँव रहने दो ||

कभी पहचानते थे लोग हमारे वालीदों को भी |
हमें अब जानते हैं लोग महज़ एक फ्लैट नंबर से ||
इमारतबाज़ कहते हैं के अब कोठी भी ढहने दो |
खुदा के वास्ते यारों गाँव को गाँव रहने दो ||

No comments:

Post a Comment

अफ़वाही ज़िंदगी

किसको है मिला सुकूँ   किसको है मिली ख़ुशी   अफ़वाही है, अफ़वाही है   अफ़वाही ज़िंदगी   ख़ुशियों की जुस्तजू में   हर कोई मिला दुखी   अफ़वाही ...