Monday, March 12, 2007
मेरा सनम है वो
वो बेवफ़ा तो है लेकिन मेरा सनम है वो
मैं ना हुआ मेरे लिये मगर अहम है वो
रुत-ए-हिज्रां फिर आ गई है याद उसकी लिये
ये और बात के इस रुत से भी सुखन है वो
कभी सुकूं नहीं मिलता तो कभी चारागरी
शब-ए-फ़िराक में अक्सर मेरा वहम है वो
अब तो सन्नाटे गूंज कर भी कुछ नहीं कहते
कोई कहता था कभी मेरा ही मेहरम है वो
कैसी उलझन है ज़िन्दगी भी अब फ़साना हुई
नाम जिस्का नहीं भूले मेरी कलम है वो
कौन कहता है के वो आज मेरे पास नहीं
इन हवाओं में शुआओं में हर कदम है वो
वो बेवफ़ा तो है लेकिन मेरा सनम है वो
मैं ना हुआ मेरे लिये मगर अहम है वो
रुत-ए-हिज्रां फिर आ गई है याद उसकी लिये
ये और बात के इस रुत से भी सुखन है वो
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अफ़वाही ज़िंदगी
किसको है मिला सुकूँ किसको है मिली ख़ुशी अफ़वाही है, अफ़वाही है अफ़वाही ज़िंदगी ख़ुशियों की जुस्तजू में हर कोई मिला दुखी अफ़वाही ...
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किसको है मिला सुकूँ किसको है मिली ख़ुशी अफ़वाही है, अफ़वाही है अफ़वाही ज़िंदगी ख़ुशियों की जुस्तजू में हर कोई मिला दुखी अफ़वाही ...
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वक्त गुज़रा हुआ सा लग रहा है और सब कुछ हुआ सा लग रहा है तुझको देखा है जबसे दिल पे मेरे कोई जादू हुआ सा लग रहा है तेरी खुशबू जो यादों ने उठाई...
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रात की बात अंधेरों में फैल जाती है धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिल...
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