Monday, October 9, 2006

मैनें मै पी है आज आंखों से

मैनें मै पी है आज आंखों से
ज़िन्दगी जी है आज आंखों से

जो बात कह न सका कर न सका लफ़्ज़ों से
वो बात की है आज आंखों से

इक हसीं रात जिसे देख्नने की कोशिश थी
वो देख्न ली है आज आंखों से

जिस तसल्ली के लिये ठोकरें खाई थी कभी
वो तुमने दी है आज आंखों से

जो वासतों का, सबब का सवाल करते थे
वो हमन्शीं हैं आज आंखों से

उस्की बेताब सी नज़रों में मौज की लहरें
कैसे ठहरी हैं आज आंखों से

एक दिन ख्नाब में साक़ी से क्या कही थी विवेक
वही कही थी जो कही है आज आंखों से

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